महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1199, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
शरीरके भीतर जठरानल तथा प्राण-अपान आदि वायुओंकी स्थिति आदिका वर्णन
भरद्वाज उवाच
पार्थिवं धातुमासाद्य शारीरोऽग्निः कथं प्रभो । अवकाशविशेषेण कथं वर्तयतेऽनिलः ॥ १ ॥ **भरद्वाजने पूछा—**प्रभो! शरीरके भीतर रहनेवाली अग्नि पार्थिव धातु (पांचभौतिक देह) का आश्रय लेकर कैसे रहती है और वायु भी उसी पार्थिव धातुका आश्रय लेकर अवकाश-विशेषके द्वारा देहको कैसे चेष्टाशील बनाती है? ॥ १ ॥
भृगुरुवाच
वायोर्गतिमहं ब्रह्मन् कथयिष्यामि तेऽनघ । प्राणिनामनिलो देहान् यथा चेष्टयते बली ॥ २ ॥ **भृगुने कहा—**ब्रह्मन्! निष्पाप महर्षे! मैं तुमसे वायुकी गतिका वर्णन करता हूँ। प्रबल वायु प्राणियोंके शरीरोंको किस प्रकार चेष्टाशील बनाती है? यह बताता हूँ ॥ २ ॥
श्रितो मूर्धानमात्मा तु शरीरं परिपालयन् । प्राणो मूर्धनि चाग्नौ च वर्तमानो विचेष्टते ॥ ३ ॥ आत्मा मस्तकके रन्ध्रस्थानमें स्थित होकर सम्पूर्ण शरीरकी रक्षा करता है और प्राण मस्तक तथा अग्नि दोनोंमें स्थित होकर शरीरको चेष्टाशील बनाता है ॥ ३ ॥
स जन्तुः सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः । मनो बुद्धिरहङ्कारो भूतानि विषयश्च सः ॥ ४ ॥ वह प्राणसे संयुक्त आत्मा ही जीव है, वही सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा सनातन पुरुष है। वही मन, बुद्धि, अहंकार, पाँचों भूत और विषयरूप हो रहा है ॥ ४ ॥
एवं त्विह स सर्वत्र प्राणेन परिचाल्यते । पृष्ठतस्तु समानेन स्वां स्वां गतिमुपाश्रितः ॥ ५ ॥ इस प्रकार (जीवात्मासे संयुक्त हुए) प्राणके द्वारा शरीरके भीतरके समस्त विभाग तथा इन्द्रिय आदि सारे बाह्य अंग परिचालित होते हैं। तत्पश्चात् समान वायुके रूपमें परिणत हो प्राण ही अपनी-अपनी गतिके आश्रित शरीरका संचालक होता है ॥ ५ ॥
बस्तिमूलं गुदं चैव पावकं समुपाश्रितः । वहन्मूत्रं पुरीषं चाप्यपानः परिवर्तते ॥ ६ ॥