महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1203, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्षिप्रं प्रविश्य नश्येत यथा नश्यत्यसौ तथा ॥ ६ ॥ पञ्चधारणके ह्यस्मिन् शरीरे जीवितं कुतः । तेषामन्यतराभावाच्चतुर्णं नास्ति संशयः ॥ ७ ॥ अथवा जैसे कुआँमें जल गिराया जाय या जलती आगमें जला हुआ दीपक डाल दिया जाय, तो वे दोनों शीघ्र ही उनमें प्रविष्ट होकर अपना पृथक् अस्तित्व खो बैठते हैं। उसी प्रकार पांचभौतिक शरीरका नाश होनेपर जीव भी पाँचों तत्त्वमें विलीन होकर अपने पृथक् अस्तित्वसे रहित हो जाना चाहिये, ऐसा मान लेनेपर तो पाँच भूतोंसे धारण किये हुए इस शरीरमें जीव है ही कहाँ? अतः यह सिद्ध हुआ कि पांचभौतिक संघातसे भिन्न जीव नहीं है; उन पाँच तत्त्वोंमेंसे किसी एकका अभाव होनेपर शेष चारोंका भी अभाव हो जाता है—इसमें संशय नहीं है ॥ ६-७ ॥
नश्यन्त्यापो ह्यनाहाराद् वायुरुच्छ्वासनिग्रहात् । नश्यते कोष्ठभेदात् खमग्निर्नश्यत्यभोजनात् ॥ ८ ॥ जलका सर्वथा त्याग करनेसे शरीरके जलीय अंशका नाश हो जाता है, श्वास रुक जानेसे वायुका नाश होता है। उदरका भेदन होनेसे आकाशतत्त्व नष्ट होता है और भोजन बंद कर देनेसे शरीरके अग्नितत्त्वका नाश हो जाता है ॥ ८ ॥
व्याधिव्रणपरिक्लेशैर्मेदिनी चैव शीर्यते । पीडितेऽन्यतरे ह्येषां संघातॊ याति पञ्चधा ॥ ९ ॥ ज्वर आदि रोग, घाव तथा अन्यान्य प्रकारके क्लेशोंसे शरीरका पृथ्वीतत्त्व बिखर जाता है। इन पाँचों तत्त्वोंमेंसे एक तत्त्वको भी यदि हानि पहुँची तो इनका सारा संघात ही पंचत्वको प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥
तस्मिन् पञ्चत्वमापन्ने जीवः किमनुधावति । किं वेदयति वा जीवः किं शृणोति ब्रवीति च ॥ १० ॥ पांचभौतिक संघात (शरीर) के नष्ट होनेपर यदि जीव है तो वह किसके पीछे दौड़ता है? क्या अनुभव करता है? क्या सुनता है और क्या बोलता है? ॥ १० ॥
एषा गौः परलोकस्थं तारयिष्यति मामिति । यो दत्त्वा म्रियते जन्तुः सा गौः कं तारयिष्यति ॥ ११ ॥ मृत्युके समय लोग इस आशासे गोदान करते हैं कि यह गौ परलोकमें जानेपर मुझे तार देगी; परंतु जीव तो गोदान करके मर जाता है; फिर वह गौ किसको तारेगी? ॥ ११ ॥
गौश्च प्रतिग्रहीता च दाता चैव समं यदा । इहैव विलयं यान्ति कुतस्तेषां समागमः ॥ १२ ॥ गौ, गोदान करनेवाला मनुष्य तथा उसको लेनेवाला ब्राह्मण—ये तीनों जब यहीं मर जाते हैं, तब परलोकमें उनका कैसे समागम होता है? ॥ १२ ॥
विहगैरुपभुक्तस्य शैलाग्रात् पतितस्य च ।