महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1206, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंबिना किसी आश्रयके अग्निका ग्रहण होना अत्यन्त कठिन है ।। ५ ।। तथा शरीरसंत्यागे जीवो ह्याकाशवत् स्थितः । न गृह्यते तु सूक्ष्मत्वाद् यथा ज्योतिर्न संशयः ।। ६ ।। उसी प्रकार शरीरको त्याग देनेपर जीव आकाशकी भाँति स्थित होता है। वह अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण बुझी हुई आगके समान अनुभवमें नहीं आता, परंतु रहता अवश्य है; इसमें संशय नहीं है ।। ६ ।। प्राणान् धारयते ह्यग्निः स जीव उपधार्यताम् । वायुसंधारणो ह्यग्निर्नश्यत्युच्छ्वासनिग्रहात् ।। ७ ।। अग्नि प्राणोंको धारण करती है। जीवको उस अग्निके समान ही ज्योतिर्मय समझो। उस अग्निको वायु देहके भीतर धारण किये रहती है। श्वास रुक जानेपर वायुके साथ-साथ अग्नि भी नष्ट हो जाती है ।। ७ ।। तस्मिन् नष्टे शरीराग्नौ ततो देहमचेतनम् । पतितं याति भूमित्वमयनं तस्य हि क्षितिः ।। ८ ।। जङ्गमानां हि सर्वेषां स्थावराणां तथैव च । आकाशं पवनोऽन्वेति ज्योतिस्तमनुगच्छति । तेषां त्रयाणामेकत्वाद् द्वयं भूमौ प्रतिष्ठितम् ।। ९ ।। उस शरीराग्निके नष्ट होनेपर अचेतन शरीर पृथ्वीपर गिरकर पार्थिवभावको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि पृथ्वी ही उसका आधार है। समस्त स्थावरों और जंगमोंकी प्राणवायु आकाशको प्राप्त होती है और अग्नि भी उस वायुका ही अनुसरण करती है। इस प्रकार आकाश, वायु और अग्नि—ये तीन तत्त्व एकत्र हो जाते हैं और जल तथा पृथ्वी—दो तत्त्व भूमिपर ही रह जाते हैं ।। ८-९ ।। यत्र खं तत्र पवनस्तत्राग्निर्यत्र मारुतः । अमूर्तयस्ते विज्ञेया मूर्तिमन्तः शरीरिणाम् ।। १० ।। जहाँ आकाश होता है, वहीं वायुकी स्थिति होती है और जहाँ वायु होती है, वहीं अग्नि भी रहती है। ये तीनों तत्त्व यद्यपि निराकार हैं तथापि देहधारियोंके शरीरोंमें स्थित होकर मूर्तिमान् समझे जाते हैं ।। १० ।।
भरद्वाज उवाच यद्यग्निमारुतौ भूमिः खमापश्च शरीरिषु । जीवः किंलक्षणस्तत्रेत्येतदाचक्ष्व मेऽनघ ।। ११ ।। भरद्वाजने पूछा—निष्पाप मुनिवर! यदि देह-धारियोंके शरीरोंमें केवल अग्नि, वायु, भूमि, आकाश और जल-तत्त्व ही विद्यमान है तो उनमें रहनेवाले जीवके क्या लक्षण हैं? यह मुझे बताइये ।। ११ ।।