महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1222, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमोंके धर्मका वर्णन
भरद्वाज उवाच
दानस्य किं फलं प्राहुर्धर्मस्य चरितस्य च ।
तपसश्च सुतप्तस्य स्वाध्यायस्य हुतस्य वा ॥ १ ॥
**भरद्वाजने पूछा—**ब्रह्मन्! आचरणमें लाये हुए दानरूप धर्मका, भलीभाँति की हुई तपस्याका तथा स्वाध्याय और अग्निहोत्रका क्या फल बताया गया है? ॥ १ ॥
भृगुरुवाच
हुतेन शाम्यते पापं स्वाध्यायैः शान्तिरुत्तमा ।
दानेन भोगानित्याहुस्तपसा स्वर्गमाप्नुयात् ॥ २ ॥
**भृगुजीने कहा—**मुने! अग्निहोत्रसे पापका निवारण किया जाता है, स्वाध्यायसे उत्तम शान्ति मिलती है, दानसे भोगोंकी प्राप्ति बतायी गयी है और तपस्यासे मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है ॥ २ ॥
दानं तु द्विविधं प्राहुः परत्रार्थमिहैव च ।
सद्द्भ्यो यद् दीयते किंचित् तत्परत्रोपतिष्ठते ॥ ३ ॥
असद्द्भ्यो दीयते यत्तु तद् दानमिह भुज्यते ।
यादृशं दीयते दानं तादृशं फलमश्नुते ॥ ४ ॥
दान दो प्रकारका बताया जाता है—एक परलोकके लिये है और दूसरा इहलोकके लिये। सत्पुरुषोंको जो कुछ दिया जाता है, वह दान परलोकमें अपना फल देनेके लिये उपस्थित होता है और असत्पुरुषोंको जो दान दिया जाता है, उसका फल यहीं भोगा जाता है। जैसा दान दिया जाता है, वैसा ही उसका फल भी भोगनेमें आता है ॥ ३-४ ॥
भरद्वाज उवाच
किं कस्य धर्माचरणं किं वा धर्मस्य लक्षणम् ।
धर्मः कतिविधो वापि तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ ५ ॥
**भरद्वाजने पूछा—**ब्रह्मन्! किसका धर्माचरण कैसा होता है अथवा धर्मका लक्षण क्या है? या धर्मके कितने भेद हैं? यह सब आप मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ ५ ॥
भृगुरुवाच
स्वधर्माचरणे युक्ता ये भवन्ति मनीषिणः ।
तेषां स्वर्गफलावाप्तिर्योऽन्यथा स विमुह्यते ॥ ६ ॥