महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1229, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंविप्रस्तु भैक्ष्योपगतैर्हविर्भि- श्चिताग्निनां स व्रजते हि लोकम् ॥ ५ ॥ जो ब्राह्मण अग्निहोत्रको अपने शरीरमें आरोपित करके शरीरस्थ अग्निके उद्देश्यसे अपने मुखमें प्राप्त भिक्षारूप हविष्यका होम करता है, वह अग्नि-चयन करनेवाले अग्निहोत्रियोंके लोकमें जाता है ॥ ५ ॥
मोक्षाश्रमं यश्चरते यथोक्तं शुचिः सुसंकल्पितमुक्तबुद्धिः । अनिन्धनं ज्योतिरिव प्रशान्तं स ब्रह्मलोकं श्रयते मनुष्यः ॥ ६ ॥ जो बुद्धिको संकल्परहित करके पवित्र हो शास्त्रोक्त विधिके अनुसार मोक्ष-आश्रम (संन्यास) के नियमोंका पालन करता है, वह मनुष्य बिना ईंधनकी आगके समान परम शान्त ज्योतिर्मय ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥
भरद्वाज उवाच
अस्माल्लोकात् परो लोकः श्रूयते नोपलभ्यते । तमहं ज्ञातुमिच्छामि तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ ७ ॥ भरद्वाजने पूछा—ब्रह्मन्! इस लोकसे कोई श्रेष्ठ लोक सुना जाता है; किंतु वह देखनेमें नहीं आता। मैं उसे जानना चाहता हूँ, आप उसे बतानेकी कृपा करें ॥ ७ ॥
भृगुरुवाच
उत्तरे हिमवत्पार्श्वे पुण्ये सर्वगुणान्विते । पुण्यः क्षेम्यश्च काम्यश्च स परो लोक उच्यते ॥ ८ ॥ भृगुजीने कहा—मुने! उत्तरदिशामें हिमालयके पार्श्वभागमें, जो सर्वगुणसम्पन्न एवं पुण्यमय प्रदेश है, वहाँके भू-भागपर श्रेष्ठ लोक बताया जाता है, वह पवित्र, कल्याणकारी और कमनीय लोक है ॥ ८ ॥
तत्र ह्यापापकर्माणः शुचयोऽत्यन्तनिर्मलाः । लोभमोहपरित्यक्ता मानवा निरुपद्रवाः ॥ ९ ॥ वहाँ पापकर्मसे रहित, पवित्र, अत्यन्त निर्मल, लोभ और मोहसे शून्य तथा सब प्रकारके उपद्रवोंसे रहित मानव निवास करते हैं ॥ ९ ॥
स स्वर्गसदृशो देशस्तत्र ह्युक्ताः शुभा गुणाः । काले मृत्युः प्रभवति स्पृशन्ति व्याधयो न च ॥ १० ॥ वह देश स्वर्गके तुल्य है। वहाँ सभी शुभ गुणोंकी स्थिति बतायी गयी है। वहाँ समयपर ही मृत्यु होती है। रोग-व्याधि किसीका स्पर्श नहीं करते हैं ॥ १० ॥
न लोभः परदारेषु स्वदारनिरतो जनः ।