भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1231

एतानासेवते यस्तु तपस्तस्य प्रहीयते । यस्त्वेतान् नाचरेद् विद्वांस्तपस्तस्य प्रवर्धते ॥ १८ ॥ कपट, शठता, चोरी, निन्दा, दूसरोंके दोष देखना, दूसरोंको हानि पहुँचाना, प्राणियोंकी हिंसा करना, चुगली खाना और झूठ बोलना—जो इन दुर्गुणोंका सेवन करता है, उसकी तपस्या क्षीण होती है और जो विद्वान् इन दोषोंको कभी अपने आचरणमें नहीं लाता, उसकी तपस्या निरन्तर बढ़ती रहती है ॥ १७-१८ ॥

इह चिन्ता बहुविधा धर्माधर्मस्य कर्मणः । कर्मभूमिरियं लोके इह कृत्वा शुभाशुभम् । शुभैः शुभमवाप्नोति तथाशुभमथान्यथा ॥ १९ ॥ इस लोकमें पुण्य और पापकर्मके सम्बन्धमें अनेक प्रकारके विचार होते रहते हैं। यह कर्मभूमि है। इस जगत्में शुभ और अशुभ कर्म करके मनुष्य शुभ कर्मोंका शुभ फल पाता है और अशुभ कर्मोंका अशुभ फल भोगता है ॥ १९ ॥

इह प्रजापतिः पूर्वं देवाः सर्षिगणास्तथा । इष्ट्वेष्टतपसः पूता ब्रह्मलोकमुपाश्रिताः ॥ २० ॥ पूर्वकालमें यहीं प्रजापति, देवता तथा ऋषियोंने यज्ञ और अभीष्ट तपस्या करके पवित्र हो ब्रह्मलोकको प्राप्त कर लिया ॥ २० ॥

उत्तरः पृथिवीभागः सर्वपुण्यतमः शुभः । इहस्थास्तत्र जायन्ते ये वै पुण्यकृतो जनाः ॥ २१ ॥ पृथ्वीका उत्तरभाग सबसे अधिक पवित्र और मंगलमय है। इस लोकमें जो पुण्यात्मा मनुष्य हैं, वे ही मृत्युके पश्चात् उस भूभागमें जन्म लेते हैं ॥ २१ ॥

असत्कर्माणि कुर्वन्तस्तिर्यग्योनिषु चापरे । क्षीणायुषस्तथा चान्ये नश्यन्ति पृथिवीतले ॥ २२ ॥ दूसरे लोग जो यहाँ पापकर्म करते हैं, वे पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म ग्रहण करते हैं और दूसरे कितने ही आयुक्षय होनेपर नष्ट हो जाते हैं और पातालमें चले जाते हैं ॥ २२ ॥

अन्योन्यभक्षणासक्ता लोभमोहसमन्विताः । इहैव परिवर्तन्ते न ते यान्त्युत्तरां दिशम् ॥ २३ ॥ जो लोभ और मोहसे युक्त हो एक दूसरेको खा जानेके लिये उद्यत रहते हैं, वे भी इसी लोकमें आवागमन करते रहते हैं, उत्तरदिशाके उत्कृष्ट लोकमें नहीं जाने पाते हैं ॥

ये गुरून् पर्युपासन्ते नियता ब्रह्मचारिणः । पन्थानं सर्वलोकानां विजानन्ति मनीषिणः ॥ २४ ॥ जो मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए गुरुजनोंकी उपासना करते हैं, वे मनीषी पुरुष सभी लोकोंके मार्गको जानते हैं ॥ २४ ॥

इत्युक्तोऽयं मया धर्मः संक्षिप्तो ब्रह्मनिर्मितः ।