भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1234

दोनों हाथ, दोनों पैर और मुँह—इन पाँच अंगोंको धोकर* पूर्वाभिमुख हो भोजन करे। भोजनके समय मौन रहे। परोसे हुए अन्नकी निन्दा न करे। वह स्वादिष्ट हो या न हो, प्रेमसे भोजन कर ले ।। ६ ।। आर्द्रपाणिः समुत्तिष्ठेन्नार्द्रपादः स्वपेन्निशि । देवर्षिनारदः प्राह एतदाचारलक्षणम् ।। ७ ।। भोजनके बाद हाथ धोकर उठे। रातको भीगे पैर न सोये। देवर्षि नारद इसीको सदाचारका लक्षण कहते हैं ।। शुचिं देशमनड्वाहं देवगोष्ठं चतुष्पथम् । ब्राह्मणं धार्मिकं चैत्यं नित्यं कुर्यात् प्रदक्षिणम् ।। ८ ।। अतिथीनां च सर्वेषां प्रेष्याणां स्वजनस्य च । सामान्यं भोजनं भृत्यैः पुरुषस्य प्रशस्यते ।। ९ ।। यज्ञशाला आदि पवित्र स्थान, बैल, देवालय, चौराहा, ब्राह्मण, धर्मात्मा मनुष्य तथा चैत्य (देवसम्बन्धी वृक्ष)—इनको सदा दाहिने करके चले। गृहस्थ पुरुषको घरमें अतिथियों, सेवकों और स्वजनोंके लिये भी एक-सा भोजन बनवाना श्रेष्ठ माना गया है ।। ८-९ ।। सायं प्रातर्मनुष्याणामशनं वेदनिर्मितम् । नान्तरा भोजनं दृष्टमुपवासी तथा भवेत् ।। १० ।। शास्त्रमें मनुष्योंके लिये सायंकाल और प्रातःकाल दो ही समय भोजन करनेका विधान है। बीचमें भोजन करनेकी विधि नहीं देखी गयी है। जो इस नियमका पालन करता है, उसे उपवास करनेका फल प्राप्त होता है ।। १० ।। होमकाले तथा जुह्वन्नृतुकाले तथा व्रजन् । अनन्यस्त्रीजनः प्राज्ञो ब्रह्मचारी तथा भवेत् ।। ११ ।। जो होमके समय प्रतिदिन हवन करता, ऋतुकालमें स्त्रीके पास जाता और परायी स्त्रीपर कभी दृष्टि नहीं डालता, वह बुद्धिमान् पुरुष ब्रह्मचारीके समान माना जाता है ।। ११ ।। अमृतं ब्राह्मणोच्छिष्टं जनन्या हृदयं कृतम् । तज्जनाः पर्युपासन्ते सत्यं सन्तः समासते ।। १२ ।। ब्राह्मणको भोजन करानेके बाद बचा हुआ अन्न अमृत है। वह माताके स्तन्यकी भाँति हितकर है। उसको जो लोग सेवन करते हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेते हैं ।। १२ ।। लोष्टमर्दी तृणच्छेदी नखखादी तु यो नरः । नित्योच्छिष्टः शंकुशुको नेहायुर्विन्दते महत् ।। १३ ।। जो मनुष्य मिट्टीके ढेले फोड़ता, तिनके तोड़ता, नख चबाता, सदा जूठे हाथ और जूठे मुँह रहता है तथा खूँटीमें बँधे हुए तोतेके समान पराधीन जीवन बिताता है, उसे इस जगत्‌में