महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1237, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंमूर्ख मनुष्य ही जान-बूझकर किये हुए पापको छिपाता है। यद्यपि उस पापको मनुष्य नहीं देखते हैं, तो भी देवतालोग तो देखते ही हैं ॥ २७ ॥ पापेनापिहितं पापं पापमेवानुवर्तते । धर्मेणापिहितो धर्मो धर्ममेवानुवर्तते । धार्मिकेण कृतो धर्मो धर्ममेवानुवर्तते ॥ २८ ॥ पापी मनुष्यका पापके द्वारा छिपाया हुआ पाप पुनः उसे पापमें ही लगाता है और धर्मात्माका धर्मतः गुप्त रक्खा हुआ धर्म उसे पुनः धर्ममें ही प्रवृत्त करता है ॥ पापं कृतं न स्मरतीह मूढो विवर्तमानस्य तदेति कर्तुः । राहुर्यथा चन्द्रमुपैति चापि तथाबुधं पापमुपैति कर्म ॥ २९ ॥ मूर्ख मनुष्य अपने किये हुए पापको याद नहीं रखता; परंतु पापमें प्रवृत्त हुए कर्ताका पाप स्वयं ही उसके पीछे लगा रहता है, जैसे राहु चन्द्रमाके पास स्वतः पहुँच जाता है, उसी प्रकार उस मूढ़ मनुष्यके पास उसका पाप स्वयं चला जाता है ॥ २९ ॥ आशया संचितं द्रव्यं दुःखेनैवोपभुज्यते । तद् बुधा न प्रशंसन्ति मरणं न प्रतीक्षते ॥ ३० ॥ किसी विशेष कामनाकी पूर्तिकी आशासे जो धन संचित करके रखा गया है, उसका उपभोग दुःखपूर्वक ही किया जाता है; अतः विद्वान् पुरुष उसकी प्रशंसा नहीं करते हैं; क्योंकि मृत्यु किसीकी कामना-पूर्तिके अवसरकी प्रतीक्षा नहीं करती है ॥ ३० ॥ मानसं सर्वभूतानां धर्ममाहुर्मनीषिणः । तस्मात् सर्वेषु भूतेषु मनसा शिवमाचरेत् ॥ ३१ ॥ मनीषी पुरुषोंका कथन है कि समस्त प्राणियोंके लिये मनद्वारा किया हुआ धर्म ही श्रेष्ठ है; अतः मनसे सम्पूर्ण जीवोंका कल्याण सोचता रहे ॥ ३१ ॥ एक एव चरेद् धर्मं नास्ति धर्मे सहायता । केवलं विधिमासाद्य सहायः किं करिष्यति ॥ ३२ ॥ केवल वेदविधिका सहारा लेकर अकेले ही धर्मका आचरण करना चाहिये। उसमें सहायताकी आवश्यकता नहीं है। कोई दूसरा सहायक आकर क्या करेगा ॥ ३२ ॥ धर्मो योनिर्मनुष्याणां देवानाममृतं दिवि । प्रेत्यभावे सुखं धर्माच्छश्वत्तैरुपभुज्यते ॥ ३३ ॥ धर्म ही मनुष्योंकी योनि है। वही स्वर्गमें देवताओंका अमृत है। धर्मात्मा मनुष्य मरनेके पश्चात् धर्मके ही बलसे सदा सुख भोगते हैं ॥ ३३ ॥