महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1244, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंजब मनमें किसी प्रकार भी अत्यन्त हर्ष, प्रेम, आनन्द, सुख और शान्तिका अनुभव हो रहा हो, तब इन गुणोंको सात्त्विक समझना चाहिये ॥ ३४ ॥ अतुष्टिः परितापश्च शोको लोभस्तथाक्षमा । लिङ्गानि रजसस्तानी दृश्यन्ते हेत्वहेतुभिः ॥ ३५ ॥ जिस समय किसी कारणसे या बिना कारण ही असंतोष, शोक, संताप, लोभ और असहनशीलताके भाव दिखायी दें तो उन्हें रजोगुणका चिह्न जानना चाहिये ॥ ३५ ॥ अवमानस्तथा मोहः प्रमादः स्वप्नतन्द्रिता । कथंचिदभिवर्तन्ते विविधास्तामसा गुणाः ॥ ३६ ॥ इसी प्रकार जब अपमान, मोह, प्रमाद, स्वप्न, निद्रा और आलस्य आदि दोष किसी तरह भी घेरते हों तो उन्हें तमोगुणके ही विविध रूप समझे ॥ ३६ ॥ दूरगं बहुधागामि प्रार्थनासंशयात्मकम् । मनः सुनियतं यस्य स सुखी प्रेत्य चेह च ॥ ३७ ॥ जिसका दूरतक दौड़ लगानेवाला और अनेक विषयोंकी ओर जानेवाला कामनायुक्त संशयात्मक मन अच्छी तरह वशमें हो जाता है, वह मनुष्य इहलोकमें तथा मरनेके बाद परलोकमें भी सुखी होता है ॥ ३७ ॥ सत्त्वक्षेत्रज्ञयोरेतदन्तरं पश्य सूक्ष्मयोः । सृजते तु गुणानेक एको न सृजते गुणान् ॥ ३८ ॥ बुद्धि और आत्मा—ये दोनों ही सूक्ष्म तत्त्व हैं तथापि इनमें बड़ा भारी अन्तर है। तुम इस अन्तरपर दृष्टिपात करो। इनमें बुद्धि तो गुणोंकी सृष्टि करती है और आत्मा गुणोंकी सृष्टिसे अलग रहता है ॥ ३८ ॥ मशकोडुम्बरौ वापि सम्प्रयुक्तौ यथा सदा । अन्योन्यमेतौ ख्यातां च सम्प्रयोगस्तथा तयोः ॥ ३९ ॥ जैसे गूलरका फल और उसके भीतर रहनेवाले कीड़े एक साथ रहते हुए भी एक-दूसरेसे अलग हैं, उसी प्रकार बुद्धि और आत्मा दोनोंका एक साथ रहना और भिन्न-भिन्न होना समझना चाहिये ॥ ३९ ॥ पृथग्भूतौ प्रकृत्या तौ सम्प्रयुक्तौ च सर्वदा । यथा मत्स्यो जलं चैव सम्प्रयुक्तौ तथैव तौ ॥ ४० ॥ ये दोनों स्वभावसे ही अलग-अलग हैं तो भी सदा एक-दूसरेसे मिले रहते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे मछली और जल एक-दूसरेसे पृथक् होकर भी परस्पर संयुक्त रहते हैं। यही स्थिति बुद्धि और आत्माकी भी है ॥ ४० ॥ न गुणा विदुरात्मानं स गुणान् वेत्ति सर्वशः । परिद्रष्टा गुणानां तु संसृष्टान्मन्यते तथा ॥ ४१ ॥