महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1246, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंयह आत्मतत्त्व ऐसा ही निर्लिप्त एवं शुद्ध-बुद्धिस्वरूप है—ऐसा अपनी बुद्धिके द्वारा निश्चय करके ज्ञानी पुरुष हर्ष, शोक और मात्सर्य-दोषसे रहित हो सर्वत्र समानभाव रखते हुए विचरे ।। ४८ ।।
स्वभावयुक्त्या युक्तस्तु स नित्यं सृजते गुणान् । ऊर्णनाभिर्यथा सूत्रं विज्ञेयास्तन्तुवद् गुणाः ॥ ४९ ॥ आत्मा अपने स्वरूपमें स्थित रहकर ही सदा गुणोंकी सृष्टि करता है। ठीक उसी तरह, जैसे मकड़ी अपने स्वरूपमें स्थित रहती हुई ही जाला बनाती है। मकड़ीके जालेके ही समान समस्त गुणोंकी सत्ता समझनी चाहिये ॥ ४९ ॥
प्रध्वस्ता न निवर्तन्ते निवृत्तिर्नोपलभ्यते । प्रत्यक्षेण परोक्षं तदनुमानेन सिध्यति ॥ ५० ॥ एवमेकेऽध्यवस्यन्ति निवृत्तिरिति चापरे । उभयं सम्प्रधार्यैतद् व्यवस्येत यथामति ॥ ५१ ॥ आत्मसाक्षात् हो जानेपर गुण नष्ट हो जाते हैं तो भी सर्वथा निवृत्त नहीं होते हैं; क्योंकि उनकी निवृत्ति प्रत्यक्ष नहीं देखी जाती है। जो परोक्ष वस्तु है उसकी सिद्धि अनुमानसे होती है। एक श्रेणीके विद्वानोंका ऐसा ही निश्चय है। दूसरे लोग यह मानते हैं कि गुणोंकी सर्वथा निवृत्ति हो जाती है। इन दोनों मतोंपर भलीभाँति विचार करके अपनी बुद्धिके अनुसार यथार्थ वस्तुका निश्चय करना चाहिये ।। ५०-५१ ।।
इतीमं हृदयग्रन्थिं बुद्धिभेदमयं दृढम् । विमुच्य सुखमासीत न शोचेच्छिन्नसंशयः ॥ ५२ ॥ बुद्धिके द्वारा कल्पित हुआ जो भेद है, वही — हृदयकी सुदृढ़ गाँठ है। उसे खोलकर संशयरहित हो ज्ञानवान् पुरुष सुखसे रहे, कदापि शोक न करे ।। ५२ ।।
मलिनाः प्राप्नुयुः शुद्धिं यथा पूर्णां नदीं नराः । अवगाह्य सुविद्वांसो विद्धि ज्ञानमिदं तथा ॥ ५३ ॥ जैसे मैले शरीरवाले मनुष्य जलसे भरी हुई नदीमें नहा-धोकर साफ-सुथरे हो जाते हैं, उसी प्रकार इस ज्ञानमयी नदीमें अवगाहन करके मलिनचित्त मनुष्य भी शुद्ध एवं ज्ञानसम्पन्न हो जाते हैं—ऐसा जानो ।। ५३ ।।
महानद्या हि पारज्ञस्तप्यते न तदन्यथा । न तु तप्यति तत्त्वज्ञः फले ज्ञाते तरत्युत ॥ ५४ ॥ किसी महानदीके पारको जाननेवाला पुरुष केवल जाननेमात्रसे कृतकृत्य नहीं होता; जबतक वह नौका आदिके द्वारा वहाँ पहुँच न जाय, तबतक वह चिन्तासे संतप्त ही रहता है। परंतु तत्त्वज्ञ पुरुष ज्ञानमात्रसे ही संसार-सागरसे पार हो जाता है; उसे संताप नहीं होता। क्योंकि यह ज्ञान स्वयं ही पुलस्वरूप है ।। ५४ ।।
एवं ये विदुराध्यात्मं केवलं ज्ञानमुत्तमम् ॥ ५५ ॥