भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1248, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1248

जो निष्काम भावसे कर्म करता है, उसका वह कर्म पहलेके किये हुए समस्त कर्म-

संस्कारोंका नाश कर देता है। पूर्वजन्म और इस जन्मके किये हुए वे दोनों प्रकारके कर्म

उस पुरुषके लिये न तो अप्रिय फल उत्पन्न करते हैं और न तो प्रिय फलके ही जनक होते हैं

(क्योंकि कर्तापनके अभिमान और फलकी आसक्तिसे शून्य होनेके कारण उनका उन

कर्मोंसे सम्बन्ध नहीं रह जाता) ।। ६१ ।।

लोकमातुरमसूयते जन-

स्तस्य तज्जनयतीह सर्वतः ।। ६२ ।।

जो काम, क्रोध आदि दुर्व्यसनोंसे आतुर रहता है, उसे विचारवान् पुरुष धिक्कारते हैं।

उसके निन्दनीय कर्म उस आतुर मानवको सभी योनियों (पशु-पक्षी आदिके शरीरों)-में

जन्म दिलाता है ।। ६२ ।।

लोक आतुरजनान् विराविण-

स्तत्तदेव बहु पश्य शोचतः ।

तत्र पश्य कुशलानशोचतो

ये विदुस्तदुभयं पदं सताम् ।। ६३ ।।

लोकमें भोगासक्तिके कारण आतुर रहनेवाले लोग स्त्री, पुत्र आदिके नाश होनेपर

उनके लिये बहुत शोक करते और फूट-फूटकर रोते हैं। तुम उनकी इस दुर्दशाको देख लो।

साथ ही जो सारासार-विवेकमें कुशल हैं और सत्पुरुषोंको प्राप्त होनेवाले दो प्रकारके

पदको अर्थात् सगुण-उपासना और निर्गुण-उपासनाके फलको जानते हैं, वे कभी शोक

नहीं करते। उनकी अवस्थापर भी दृष्टिपात कर लो (फिर तुम्हें अपने लिये जो हितकर

दिखायी दे, उसी पथका आश्रय लो) ।। ६३ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अध्यात्मकथने

चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १९४ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारतमें शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें अध्यात्मतत्त्वका

वर्णनविषयक एक सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १९४ ।।

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