भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1250

योगको जाननेवाले समर्थ पुरुषको चाहिये कि कानोंके द्वारा शब्द न सुने, त्वचासे स्पर्शका अनुभव न करे, आँखसे रूपको न देखे और जिह्वासे रसोंको ग्रहण न करे एवं ध्यानके द्वारा समस्त सूँघने योग्य वस्तुओंको भी त्याग दे तथा पाँचों इन्द्रियोंको मथ डालनेवाले इन विषयोंकी कभी मनसे भी इच्छा न करे ।। ६-७ ।। ततो मनसि संगृह्य पञ्चवर्गं विचक्षणः । समादध्यानमनो भ्रान्तमिन्द्रियैः सह पञ्चभिः ॥ ८ ॥ तत्पश्चात् बुद्धिमान् एवं विद्वान् पुरुष पाँचों इन्द्रियोंको मनमें स्थिर करे। उसके बाद पाँचों इन्द्रियोंसहित चंचल मनको परमात्माके ध्यानमें एकाग्र करे ।। ८ ।। विसंचारि निरालम्बं पञ्चद्वारं चलाचलम् । पूर्वं ध्यानपथे धीरः समादध्यानमनोऽन्तरा ॥ ९ ॥ मन नाना प्रकारके विषयोंमें विचरण करनेवाला है। उसका कोई स्थिर आलम्बन नहीं है। पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ उसके इधर-उधर निकलनेके द्वार हैं तथा वह अत्यन्त चंचल है। ऐसे मनको धीर योगी पुरुष पहले अपने हृदयके भीतर ध्यानमार्गमें एकाग्र करे ।। ९ ।। इन्द्रियाणि मनश्चैव यदा पिण्डीकरोत्ययम् । एष ध्यानपथः पूर्वो मया समनुवर्णितः ॥ १० ॥ जब यह योगी इन्द्रियोंसहित मनको एकाग्र कर लेता है, तभी उसके प्रारम्भिक ध्यानमार्गका आरम्भ होता है। युधिष्ठिर! यह मैंने तुम्हारे निकट प्रथम ध्यानमार्गका वर्णन किया है ।। १० ।। तस्य तत् पूर्वसंरुद्धमात्मनः षष्ठमान्तरम् । स्फुरिष्यति समुद्भ्रान्ता विद्युदम्बुधरे यथा ॥ ११ ॥ इस प्रकार प्रयत्न करनेसे जो इन्द्रियोंसहित मन कुछ देरके लिये स्थिर हो जाता है, वही फिर अवसर पाकर जैसे बादलोंमें बिजली चमक उठती है, उसी प्रकार पुनः बारंबार विषयोंकी ओर जानेके लिये चंचल हो उठता है ।। ११ ।। जलबिन्दुर्यथा लोलः पर्णस्थः सर्वतश्चलः । एवमेवास्य चित्तं च भवति ध्यानवर्त्मनि ॥ १२ ॥ जैसे पत्तेपर पड़ी हुई पानीकी बूँद सब ओरसे हिलती रहती है, उसी प्रकार ध्यानमार्गमें स्थित साधकका मन भी प्रारम्भमें चंचल होता रहता है ।। १२ ।। समाहितं क्षणं किञ्चिद् ध्यानवर्त्मनि तिष्ठति । पुनर्वायुपथं भ्रान्तं मनो भवति वायुवत् ॥ १३ ॥ एकाग्र करनेपर कुछ देर तो वह ध्यानमें स्थित रहता है; परंतु फिर नाड़ी मार्गमें पहुँचकर भ्रान्त-सा होकर वायुके समान चंचल हो उठता है ।। १३ ।। अनिर्वेदो गतक्लेशो गततन्द्रिरमत्सरी । समादध्यात् पुनश्चेतो ध्यानेन ध्यानयोगवित् ॥ १४ ॥