महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1255, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुशैः परिवृतस्तस्मिन् मध्ये छन्नः कुशैस्तथा ॥ १४ ॥ निवृत्तिमार्गपर पहुँचनेकी विधि यह है—जपकर्ताको कुशासनपर बैठना चाहिये। उसे अपने हाथमें भी कुश रखना चाहिये। शिखामें भी कुश बाँध लेना चाहिये, वह कुशोंसे घिरकर बैठे और मध्यभागमें भी कुशोंसे आच्छादित रहे ॥ १४ ॥ विषयेभ्यो नमस्कुर्याद् विषयान्न च भावयेत् । साम्यमुत्पाद्य मनसा मनस्येव मनो दधत् ॥ १५ ॥ विषयोंको दूरसे ही नमस्कार करे और कभी उनका अपने मनमें चिन्तन न करे। मनसे समताकी भावना करके मनका मनमें ही लय करे ॥ १५ ॥ तद् धिया ध्यायति ब्रह्म जपन् वै संहिताम् हिताम् । संन्यस्यत्यथवा तां वै समाधौ पर्यवस्थितः ॥ १६ ॥ फिर बुद्धिके द्वारा परब्रह्म परमात्माका ध्यान करे तथा सर्व-हितकारिणी वेदसंहिताका एवं प्रणव और गायत्री मन्त्रका जप करे। फिर समाधिमें स्थित होनेपर उस संहिता एवं गायत्री मन्त्र आदिके जपको भी त्याग दे ॥ ध्यानमुत्पादयत्यत्र संहिताबलसंश्रयात् । शुद्धात्मा तपसा दान्तो निवृत्तद्वेषकामवान् ॥ १७ ॥ अरागमोहो निर्द्वन्द्वो न शोचति न सज्जते । न कर्ता कारणानां च न कार्याणामिति स्थितिः ॥ १८ ॥ संहिताके जपसे जो बल प्राप्त होता है, उसका आश्रय लेकर साधक अपने ध्यानको सिद्ध कर लेता है। वह शुद्धचित्त होकर तपके द्वारा मन और इन्द्रियोंको जीत लेता है तथा द्वेष और कामनासे रहित एवं आसक्ति और मोहसे रहित हुआ शीत और उष्ण आदि समस्त द्वन्द्वोंसे अतीत हो जाता है। अतः वह न तो कभी शोक करता है और न कहीं भी आसक्त होता है। वह कर्मोंका कारण और कार्यका कर्ता नहीं होता (अर्थात् अपनेमें कर्तापनका अभिमान नहीं लाता) ॥ न चाहङ्कारयोगेन मनः प्रस्थापयेत् क्वचित् । न चार्थग्रहणे युक्तो नावमानी न चाक्रियः ॥ १९ ॥ वह अहंकारसे मुक्त होकर कहीं भी अपने मनको नहीं लगाता है। वह न तो स्वार्थ-साधनमें संलग्न होता है, न किसीका अपमान करता है और न अकर्मण्य होकर ही बैठता है ॥ १९ ॥ ध्यानक्रियापरो युक्तो ध्यानवान् ध्याननिश्चयः । ध्याने समाधिमुत्पाद्य तदपि त्यजति क्रमात् ॥ २० ॥ वह ध्यानरूप क्रियामें ही नित्य तत्पर रहता है, ध्याननिष्ठ हो ध्यानके द्वारा ही तत्त्वका निश्चय कर लेता है, ध्यानमें समाधिस्थ होकर क्रमशः ध्यानरूप क्रियाका भी त्याग कर देता है ॥ २० ॥