भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 126

कुपित हुई उस मनस्विनी एवं प्रिय रानीने एकान्तमें यह युक्तियुक्त बात कही— ॥ ४—६ ॥

कथमुत्सृज्य राज्यं स्वं धनधान्यसमन्वितम् ।
कापालीं वृत्तिमास्थाय धानामुष्टिर्न ते वरः ॥ ७ ॥
'राजन्! आपने धन-धान्यसे सम्पन्न अपना राज्य छोड़कर यह खपड़ा लेकर भीख माँगनेका धंधा कैसे अपना लिया? यह मुट्ठीभर जौ आपको शोभा नहीं दे रहा है ॥ ७ ॥

प्रतिज्ञा तेऽन्यथा राजन् विचेष्टा चान्यथा तव ।
यद् राज्यं महदुत्सृज्य स्वल्पे तुष्यसि पार्थिव ॥ ८ ॥
'नरेश्वर! आपकी प्रतिज्ञा तो कुछ और थी और चेष्टा कुछ और ही दिखायी देती है। भूपाल! आपने विशाल राज्य छोड़कर थोड़ी-सी वस्तुमें संतोष कर लिया ॥ ८ ॥

नैतेनातिथयो राजन् देवर्षिपितरस्तथा ।
अद्य शक्यास्त्वया भर्तुं मोघस्तेऽयं परिश्रमः ॥ ९ ॥
'राजन्! इस मुट्ठीभर जौसे देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा अतिथियोंका आप भरण-पोषण नहीं कर सकते, अतः आपका यह परिश्रम व्यर्थ है ॥ ९ ॥

देवतातिथिभिश्चैव पितृभिश्चैव पार्थिव ।
सर्वैरेतैः परित्यक्तः परिव्रजसि निष्क्रियः ॥ १० ॥
'पृथ्वीनाथ! आप सम्पूर्ण देवताओं, अतिथियों और पितरोंसे परित्यक्त होकर अकर्मण्य हो घर छोड़ रहे हैं ॥

यस्त्वं त्रैविद्यवृद्धानां ब्राह्मणानां सहस्रशः ।
भर्ता भूत्वा च लोकस्य सोऽद्य तैर्भृतिमिच्छसि ॥ ११ ॥
'तीनों वेदोंके ज्ञानमें बढ़े-चढ़े सहस्रों ब्राह्मणों तथा इस सम्पूर्ण जगत्का भरण-पोषण करनेवाले होकर भी आज आप उन्हींके द्वारा अपना भरण-पोषण चाहते हैं ॥

श्रियं हित्वा प्रदीप्तां त्वं श्ववत् सम्प्रति वीक्ष्यसे ।
अपुत्रा जननी तेऽद्य कौसल्या चापतिस्त्वया ॥ १२ ॥
'इस जगमगाती हुई राजलक्ष्मीको छोड़कर इस समय आप दर-दर भटकनेवाले कुत्तेके समान दिखायी देते हैं। आज आपके जीते-जी आपकी माता पुत्रहीन और यह अभागिनी कौसल्या पतिहीन हो गयी ॥ १२ ॥

अमी च धर्मकामास्त्वां क्षत्रियाः पर्युपासते ।
त्वदाशामभिकांक्षन्तः कृपणाः फलहेतुकाः ॥ १३ ॥
'ये धर्मकी इच्छा रखनेवाले क्षत्रिय जो सदा आपकी सेवामें बैठे रहते हैं, आपसे बड़ी-बड़ी आशाएँ रखते हैं, इन बेचारोंको सेवाका फल चाहिये ॥ १३ ॥

तांश्च त्वं विफलान् कुर्वन् कं नु लोकं गमिष्यसि ।
राजन् संशयिते मोक्षे परतन्त्रेषु देहिषु ॥ १४ ॥