भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1262, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1262

राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें यथार्थरूपसे ये सभी नरक बताये हैं। उस परमपदके सामने वस्तुतः वे सभी लोक ‘नरक’ ही कहलाने योग्य हैं ।। ११ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि जापकोपाख्याने अष्टनवतयधिकशततमोऽध्यायः ।। १९८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें जापकका उपाख्यानविषयक एक सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १९८ ।।


१-श्रुति भी कहती है—‘अशरीरं वावसन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः।’
२-आठ पुरियोंका बोधक वचन इस प्रकार उपलब्ध होता है—
भूतेन्द्रियमनोबुद्धिवासनाकर्मवायवः । अविद्या चेत्यमुं वर्गमाहुः पुर्यष्टकं बुधाः ।।
३-इन लक्षणोंका नाम-निर्देश श्रुतिमें इस प्रकार किया गया है—‘न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतारं शृणुयान्न मतेर्मन्तारमन्वीथा न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः ।

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