भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1265, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1265

सावित्रीदेवीके ऐसा कहनेपर वह धर्मात्मा ब्राह्मण बोला—'शुभे! इस मन्त्रके जपमें मेरी यह इच्छा बराबर बढ़ती रहे और मेरे मनकी एकाग्रता भी प्रतिदिन बढ़े' ॥ १२½ ॥ तत् तथेति ततो देवी मधुरं प्रत्यभाषत ॥ १३ ॥ इदं चैवापरं प्राह देवी तत्प्रियकाम्यया । निरयं नैव याता त्वं यत्र याता द्विजर्षभाः ॥ १४ ॥ यास्यसि ब्रह्मणः स्थानमनिमित्तमनिन्दितम् । साधये भविता चैतद् यत्त्वयाहमिहार्थिता ॥ १५ ॥ नियतो जप चैकाग्रो धर्मस्त्वां समुपैष्यति । कालो मृत्युर्यमश्चैव समायास्यन्ति तेऽन्तिकम् ॥ १६ ॥ भविता च विवादोऽत्र तव तेषां च धर्मतः । तब सावित्रीदेवीने मधुर वाणीमें 'तथास्तु' कहा। इसके बाद देवीने ब्राह्मणका प्रिय करनेकी इच्छासे यह दूसरा वचन और कहा—'विप्रवर! जहाँ दूसरे श्रेष्ठ ब्राह्मण गये हैं, उन स्वर्गादि निम्नश्रेणीके लोकोंमें तुम नहीं जाओगे। तुम्हें स्वभावसिद्ध एवं निर्दोष ब्रह्मपदकी प्राप्ति होगी। तुमने मुझसे जो यहाँ प्रार्थना की है, वह पूरी होगी। मैं उसे पूर्ण करनेकी चेष्टा करूँगी। तुम नियमपूर्वक एकाग्रचित्त होकर जप करो। धर्म स्वयं तुम्हारी सेवामें उपस्थित होगा। काल, मृत्यु और यम भी तुम्हारे निकट पधारेंगे, तुम्हारा उन सबके साथ यहाँ धर्मानुकूल वाद-विवाद भी होगा ॥ १३—१६½ ॥

भीष्म उवाच

एवमुक्त्वा भगवती जगाम भवनं स्वकम् ॥ १७ ॥ ब्राह्मणोऽपि जपन्नास्ते दिव्यं वर्षशतं तथा । भीष्मजी कहते हैं—राजन्! ऐसा कहकर भगवती सावित्री देवी अपने धामको चली गयीं और ब्राह्मण भी दिव्य सौ वर्षोंतक पूर्ववत् जपमें संलग्न रहा ॥ १७½ ॥ सदा दान्तो जितक्रोधः सत्यसंधोऽनसूयकः ॥ १८ ॥ समाप्ते नियमे तस्मिन्नथ विप्रस्य धीमतः । साक्षात् प्रीतस्तदा धर्मो दर्शयामास तं द्विजम् ॥ १९ ॥ वह सदा मन और इन्द्रियोंको संयममें रखता था, क्रोधको जीत चुका था। अपनी की हुई प्रतिज्ञाका सच्चाईके साथ पालन करता था और किसीके दोष नहीं देखता था। बुद्धिमान् ब्राह्मणका वह नियम पूर्ण होनेपर साक्षात् भगवान् धर्म उस समय उसपर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया ॥ १८-१९ ॥

धर्म उवाच

द्विजाते पश्य मां धर्ममहं त्वां द्रष्टुमागतः । जप्यस्यास्य फलं यत्तत् सम्प्राप्तं तच्च मे शृणु ॥ २० ॥