भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1282

ब्राह्मणने कहा-राजन्! मैंने संहिताका जप करते हुए कहींसे जितना भी पुण्य

अथवा सद्गुण संग्रह किया है, वह सब आप ले लें। इसके सिवा भी मेरे पास जो कुछ पुण्य

हो, उसे ग्रहण करें ।। ११३ ।।

राजोवाच

जलमेतन्निपतितं मम पाणौ द्विजोत्तम ।

सममस्तु सहैवास्तु प्रतिगृह्णातु वै भवान् ।। ११४ ।।

राजाने कहा- द्विजश्रेष्ठ! मेरे हाथपर यह संकल्पका जल पड़ा हुआ है। मेरा और

आपका सारा पुण्य हम दोनों के लिये समान हो और हम साथ-साथ उसका उपभोग करें;

इस उद्देश्यसे आप मेरा दिया हुआ दान भी ग्रहण करें ।। ११४ ।।

विरूप उवाच

कामक्रोधौ विद्धि नौ त्वमावाभ्यां कारितो भवान् ।

सहेति च यदुक्तं ते समा लोकास्तवास्य च ।। ११५ ।।

विरूपने कहा- राजन्! आपको विदित हो कि हम दोनों काम और क्रोध हैं। हमने ही

आपको इस कार्यमें लगाया है। आपने जो साथ-साथ फल भोगनेकी बात कही है, इससे

आपको और इस ब्राह्मणको एक समान लोक प्राप्त होंगे ।। ११५ ।।

नायं धारयते किञ्चिज्जिज्ञासा त्वत्कृते कृता ।

कालो धर्मस्तथा मृत्युः कामक्रोधौ तथा युवाम् ।। ११६ ।।

सर्वमन्योन्यनिष्कर्षे निघृष्टं पश्यतस्तव ।

गच्छ लोकान् जितान् स्वेन कर्मणा यत्र वाञ्छसि ।। ११७ ।।

यह मेरा साथी कुछ भी धारण नहीं करता अथवा मुझपर भी इसका कोई ऋण नहीं है।

यह सब खेल तो हमलोगोंने आपकी परीक्षा लेनेके लिये किया था। काल, धर्म, मृत्यु, काम,

क्रोध और आप दोनों-ये सब-के-सब एक-दूसरेकी कसौटीपर आपके देखते-देखते कसे

गये हैं। अब जहाँ आपकी इच्छा हो, अपने कर्मसे जीते हुए उन लोकोंमें

जाइये ।। ११६-११७ ।।

जापकानां फलावाप्तिर्मया ते सम्प्रदर्शिता ।

गतिः स्थानं च लोकाश्च जापकेन यथा जिताः ।। ११८ ।।

भीष्मजी कहते हैं- राजन्! जापकोंको किस प्रकार फलकी प्राप्ति होती है? इस

बातका दिग्दर्शन मैंने तुम्हें करा दिया। जापक ब्राह्मणने कौन-सी गति प्राप्त की? किस

स्थानपर अधिकार किया? कौन-कौन-से लोक उसके लिये सुलभ हुए? और यह सब किस

प्रकार सम्भव हुआ? ये बातें बतायी जायँगी ।। ११८ ।।

प्रयाति संहिताध्यायी ब्रह्माणं परमेष्ठिनम् ।

अथवाग्निं समायाति सूर्यमाविशतेऽपि वा ।। ११९ ।।