महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'महाबली प्रजानाथ! मुझे देवी सावित्रीने वर दिया है कि जपमें तुम्हारी नित्य श्रद्धा बनी रहेगी'॥ ६॥
राजोवाच
यद्येवमफला सिद्धिः श्रद्धा च जपितुं तव। गच्छ विप्र मया सार्धं जापकं फलमाप्नुहि॥ ७॥ राजाने कहा— विप्रवर! यदि इस प्रकार मुझे फल समर्पण करनेके कारण आपको फलकी प्राप्ति नहीं हो रही है और पुनः जप करनेमें ही आपकी श्रद्धा होती है तो आप मेरे साथ ही चलें और जप-दानजनित फलको प्राप्त करें॥ ७॥
ब्राह्मण उवाच
कृतः प्रयत्नः सुमहान् सर्वेषां संनिधाविह। सह तुल्यफलावावां गच्छावो यत्र नौ गतिः॥ ८॥ ब्राह्मणे कहा— राजन्! मैंने यहाँ सबके समीप आपको अपने जपका फल देनेके लिये महान् प्रयत्न किया है; फिर भी आपका आग्रह साथ-साथ फलका उपभोग करनेका रहा है; अतः हम दोनों समान फलके ही भागी हों। चलिये, जहाँतक हम दोनोंकी गति हो सके, साथ-साथ चलें॥ ८॥
भीष्म उवाच
व्यवसायं तयोस्तत्र विदित्वा त्रिदशेश्वरः। सह देवैरुपययौ लोकपालैस्तथैव च॥ ९॥ साध्याश्च विश्वे मरुतो वाद्यानि सुमहान्ति च। नद्यः शैलाः समुद्राश्च तीर्थानि विविधानि च॥ १०॥ तपांसि संयोगविधिर्वेदाः स्तोभाः सरस्वती। नारदः पर्वतश्चैव विश्वावसुर्हहाहूहूः॥ ११॥ गन्धर्वश्चित्रसेनश्च परिवारगणैर्युतः। नागाः सिद्धाश्च मुनयो देवदेवः प्रजापतिः॥ १२॥ विष्णुः सहस्रशीर्षश्च देवोऽचिन्त्यः समागमत्। अवाद्यन्तान्तरिक्षे च भेर्यस्तूर्याणि वा विभो॥ १३॥ भीष्मजी कहते हैं— राजन्! उन दोनोंका वहाँ ऐसा निश्चय जानकर सम्पूर्ण देवताओं तथा लोकपालोंके साथ देवराज इन्द्र उस स्थानपर आये। उनके साथ साध्यगण, विश्वेदेवगण और मरुद्गण भी थे। बड़े-बड़े वाद्य बज रहे थे। नदियाँ, पर्वत, समुद्र, नाना प्रकारके तीर्थ, तपस्या, संयोगविधि, वेद, स्तोभ (साम-गानकी पूर्तिके लिये बोले जानेवाले अक्षर हाई हावु इत्यादि), सरस्वती, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा, हूहू, परिवारसहित