भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1296

मनुरुवाच

यद् यत्प्रियं यस्य सुखं तदाहु- स्तदेव दुःखं प्रवदन्त्यनिष्टम् ॥ १० ॥ इष्टं च मे स्यादितरच्च न स्या- देतत्कृते कर्मविधिः प्रवृत्तः । इष्टं त्वनिष्टं च न मां भजेते- त्येतत्कृते ज्ञानविधिः प्रवृत्तः ॥ ११ ॥ मनुने कहा— जिसको जो-जो विषय प्रिय होता है, वही उसके लिये सुखरूप बताया गया है और जो अप्रिय होता है, उसे ही दुःखरूप कहा गया है। मुझे इष्ट (प्रिय) की प्राप्ति हो और अनिष्टका निवारण हो जाय, इसीके लिये कर्मोंका अनुष्ठान आरम्भ किया गया है तथा इष्ट और अनिष्ट दोनों ही मुझे प्राप्त न हों, इसके लिये ज्ञानयोगका उपदेश किया गया है ॥ १०-११ ॥

कामात्मकाश्छन्दसि कर्मयोगा एभिर्विमुक्तः परमश्रुवीत । नानाविधे कर्मपथे सुखार्थी नरः प्रवृत्तो न परं प्रयाति ॥ १२ ॥ वेदमें जो कर्मोंके प्रयोग बताये गये हैं, वे प्रायः सकामभावसे युक्त हैं। जो इन कामनाओंसे मुक्त होता है, वही परमात्माको पा सकता है। नाना प्रकारके कर्ममार्गमें सुखकी इच्छा रखकर प्रवृत्त होनेवाला मनुष्य परमात्माको प्राप्त नहीं होता ॥ १२ ॥

बृहस्पतिरुवाच

इष्टं त्वनिष्टं च सुखासुखे च साशीस्त्ववच्छन्दति कर्मभिश्च । बृहस्पतिने कहा— भगवन्! सुख सबको अभीष्ट होता है और दुःख किसीको भी प्रिय नहीं होता। इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टके निवारणके लिये जो कामना होती है, वही मनुष्योंसे कर्म करवाती है और उन कर्मोंद्वारा उनका मनोरथ पूर्ण करती है; अतः कामनाको आप त्याज्य कैसे बताते हैं? ॥ १२½ ॥

मनुरुवाच

एभिर्विमुक्तः परमाविवेश एतत् कृते कर्मविधिः प्रवृत्तः । कामात्मकांश्छन्दति कर्मयोग एभिर्विमुक्तः परमाददीत ॥ १३ ॥