महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1303, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंज्ञानप्रदीप्ताः परवन्त एव ॥ ९ ॥ जिस प्रकार अग्निसे प्रज्वलित दीपक स्वयं प्रकाशित होता हुआ पासमें स्थित अन्य वस्तुओंको भी प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार इस शरीररूप वृक्षमें स्थित पाँच इन्द्रियाँ चैतन्यरूपी ज्ञानके प्रकाशसे प्रकाशित होकर विषयोंको प्रकाशित करती हैं (उनका प्रकाश चिन्मय प्रकाशके ही अधीन होनेके कारण वे पराधीन हैं। स्वतः प्रकाश करनेमें समर्थ नहीं हैं) ॥ ९ ॥
यथा च राज्ञा बहवो ह्यमात्याः पृथक् प्रमाणं प्रवदन्ति युक्ताः । तद्वच्छरीरेषु भवन्ति पञ्च ज्ञानैकदेशः परमः स तेभ्यः ॥ १० ॥ जैसे किसी राजाके द्वारा भिन्न-भिन्न कार्योंमें नियुक्त किये गये बहुत-से मन्त्री अपने पृथक्-पृथक् कार्योंकी जानकारी राजाको कराते हैं। उसी प्रकार शरीरोंमें स्थित पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने एकदेशीय विषयका परिचय राजस्थानीय बुद्धिको देती हैं। जैसे मन्त्रियोंसे राजा श्रेष्ठ है, उसी प्रकार उन पाँचों इन्द्रियोंसे उनका प्रवर्तक वह ज्ञान श्रेष्ठ है ॥ १० ॥
यथार्चिषोऽग्नेः पवनस्य वेगो मरीचयोऽर्कस्य नदीषु चापः । गच्छन्ति चायान्ति च संचरन्त्य- स्तद्वच्छरीराणि शरीरिणां तु ॥ ११ ॥ जैसे अग्निकी शिखाएँ, वायुका वेग, सूर्यकी किरणें और नदियोंका बहता हुआ जल— ये सदा आते-जाते रहते हैं, इसी प्रकार देहधारियोंके शरीर भी आवागमनके प्रवाहमें पड़े हुए हैं ॥ ११ ॥
यथा च कश्चित् परशुं गृहीत्वा धूमं न पश्येज्ज्वलनं च काष्ठे । तद्वच्छरीरोदरपाणिपादं छित्त्वा न पश्यन्ति ततो यदन्यत् ॥ १२ ॥ जैसे कोई मनुष्य कुल्हाड़ी लेकर लकड़ीको चीरे तो उसमें उसे न तो आग दिखायी देगी और न धुआँ ही प्रकट होगा, उसी प्रकार इस शरीरका पेट फाड़ने या हाथ-पैर काटनेसे कोई उसे नहीं देख पाता, जो अन्तर्यामी आत्मा शरीरसे भिन्न है ॥ १२ ॥
तान्येव काष्ठानि यथा विमथ्य धूमं च पश्येज्ज्वलनं च योगात् । तद्वत् सबुद्धिः सममिन्द्रियात्मा बुधः परं पश्यति तं स्वभावम् ॥ १३ ॥