भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1305, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1305

आन्तरिक रूप और गुणको धारण नहीं करता, उसी प्रकार आत्माका स्वरूप चैतन्यमात्र इन्द्रियादिके समूह शरीरमें दिखायी देता है, किंतु उनका समुदायभूत शरीर वास्तवमें चेतन नहीं होता। एवं समीपस्थ वस्तुका जैसा रूप होता है वैसा ही रूप उस अग्निका भी प्रतीत होने लगता है ।। १७ ।।

तथा मनुष्यः परिमुच्य काय- मदृश्यमन्यद् विशते शरीरम् । विसृज्य भूतेषु महत्सु देहं तदाश्रयं चैव बिभर्ति रूपम् ।। १८ ।।

इसी तरह मनुष्य अपने दृश्य शरीरका त्याग करके जब दूसरे अदृश्य शरीरमें प्रवेश करता है, तब पहलेके स्थूल शरीरको पञ्च महाभूतोंमें मिलनेके लिये छोड़कर दूसरे शरीरका आश्रय ले उसीको अपना स्वरूप मानकर धारण करता है ।। १८ ।।

खं वायुमग्निं सलिलं तथोर्वीं समन्ततोऽभ्याविशते शरीरी । नानाश्रयाः कर्मसु वर्तमानाः श्रोत्रादयः पञ्च गुणान् श्रयन्ते ।। १९ ।।

देहाभिमानी जीव जब शरीर छोड़ता है, तब उस शरीरमें जो आकाशका अंश होता है, वह सब प्रकारसे आकाशमें, वायुका अंश वायुमें, अग्निका अंश अग्निमें, जलका अंश जलमें तथा पृथ्वीका अंश पृथ्वीमें विलीन हो जाता है। किंतु इन नाना भूतोंके आश्रित जो श्रोत्र आदि तत्त्व हैं, वे विलीन न होकर अपने-अपने कर्मोंमें प्रवृत्त रहते हैं और दूसरे शरीरमें जाकर पाँचों भूतोंका आश्रय ले लेते हैं ।। १९ ।।

श्रोत्रं खतो घ्राणमथो पृथिव्या- स्तेजोमयं रूपमथो विपाकः । जलाश्रयं स्वेदमुक्तं रसं च वाय्वात्मकः स्पर्शकृतो गुणश्च ।। २० ।।

आकाशसे श्रोत्रेन्द्रिय (और उसका विषय शब्द), पृथ्वीसे घ्राणेन्द्रिय (और उसका विषय गन्ध) होता है तथा रूप और विपाक वे दोनों (एवं नेत्र-इन्द्रिय)—ये सब तेजोमय हैं। स्वेद एवं रस (और रसना-) इन्द्रिय—ये जलके आश्रित हैं। एवं स्पर्श करनेवाली इन्द्रिय और स्पर्श यह वायुस्वरूप है ।। २० ।।

महत्सु भूतेषु वसन्ति पञ्च पञ्चेन्द्रियार्थाश्च तथेन्द्रियाणि । सर्वाणि चैतानि मनोऽनुगानि बुद्धिं मनोऽन्वेति मतिः स्वभावम् ।। २१ ।।

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