भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1310

जैसे चन्द्रमा अमावास्याको अपने प्रकाश्य स्थानसे वियुक्त हो जानेके कारण दिखायी नहीं देता है, उसी प्रकार देहधारी आत्मा शरीरसे वियुक्त होनेपर दृष्टिगोचर नहीं होता है ।। १६ ।।

यथाऽऽकाशान्तरं प्राप्य चन्द्रमा भ्राजते पुनः । तद्वल्लिङ्गान्तरं प्राप्य शरीरी भ्राजते पुनः ।। १७ ।। फिर वही चन्द्रमा जैसे अन्यत्र आकाशमें स्थान पाकर पुनः प्रकाशित होने लगता है, उसी प्रकार जीवात्मा दूसरा शरीर धारण करके पुनः प्रकट हो जाता है ।। १७ ।।

जन्म वृद्धिः क्षयश्चास्य प्रत्यक्षेणोपलभ्यते । सा तु चान्द्रमसी वृत्तिर्न तु तस्य शरीरिणः ।। १८ ।। जन्म, वृद्धि और क्षयका जो प्रत्यक्ष दर्शन होता है, वह चन्द्रमण्डलमें प्रतीत होनेवाली वृत्ति चन्द्रमाकी नहीं है। उसी प्रकार शरीरका ही जन्म आदि होता है, उस शरीरधारी आत्माका नहीं ।। १८ ।।

उत्पत्तिवृद्धिवयसा यथा स इति गृह्यते । चन्द्र एव त्वमावास्यां तथा भवति मूर्तिमान् ।। १९ ।। जैसे किसी व्यक्तिका जन्म होता है, वह बढ़ता है और किशोर, यौवन आदि भिन्न-भिन्न अवस्थाओंमें पहुँच जाता है तो भी यही समझा जाता है कि यह वही व्यक्ति है तथा अमावास्याके बाद जब चन्द्रमा पुनः मूर्तिमान् होकर प्रकट होता है तो यही माना जाता है कि यह वही चन्द्रमा है (उसी प्रकार दूसरे शरीरमें प्रवेश करनेपर भी वह देहधारी आत्मा वही है—ऐसा समझना चाहिये) ।। १९ ।।

नोपसर्पद् विमुञ्चद् वा शशिनं दृश्यते तमः । विसृजंश्चोपसर्पंश्च तद्वत् पश्य शरीरिणम् ।। २० ।। जैसे अन्धकाररूप राहु चन्द्रमाकी ओर आता और उसे छोड़कर जाता हुआ नहीं दिखायी देता है, उसी प्रकार जीवात्मा भी शरीरमें आता और उसे छोड़कर जाता हुआ नहीं दीख पड़ता है ऐसा समझो ।। २० ।।

यथा चन्द्रार्कसंयुक्तं तमस्तदुपलभ्यते । तद्वच्छरीरसंयुक्तः शरीरीत्युपलभ्यते ।। २१ ।। जैसे सूर्यग्रहणकालमें चन्द्रमा सूर्यसे संयुक्त होनेपर सूर्यमें छायारूपी राहुका दर्शन होता है, उसी प्रकार शरीरसे संयुक्त होनेपर शरीरधारी आत्माकी उपलब्धि होती है ।।

यथा चन्द्रार्कनिर्मुक्तः स राहुर्नोपलभ्यते । तद्वच्छरीरनिर्मुक्तः शरीरी नोपलभ्यते ।। २२ ।। जैसे चन्द्रमा-सूर्यसे अलग होनेपर सूर्यमें राहुकी उपलब्धि नहीं होती, उसी प्रकार शरीरसे विलग होनेपर शरीरधारी आत्माका दर्शन नहीं होता ।। २२ ।।

यथा चन्द्रो ह्यमावास्यां नक्षत्रैर्युज्यते गतः ।