महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1340, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंगौतमोऽथ भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ कौशिकः ।
तथैव पुत्रो भगवानृचीकस्य महात्मनः ॥ ३३ ॥
जमदग्निश्च सप्तैते उदीचीमाश्रिता दिशम् ।
आत्रेय, वसिष्ठ, महर्षि कश्यप, गौतम, भरद्वाज, कुशिकवंशी विश्वामित्र तथा महात्मा ऋचीकके पुत्र भगवान् जमदग्नि—ये सात उत्तर दिशामें रहते हैं ॥
एते प्रतिदिशं सर्वे कीर्तितास्तिग्मतेजसः ॥ ३४ ॥
साक्षिभूता महात्मानो भुवनानां प्रभावनाः ।
एवमेते महात्मानः स्थिताः प्रत्येकशो दिशम् ॥ ३५ ॥
इस प्रकार प्रत्येक दिशामें रहनेवाले सम्पूर्ण तेजस्वी महर्षियोंका वर्णन किया गया। ये महात्मा सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि करनेमें समर्थ एवं सबके साक्षी हैं। इनका हृदय बड़ा विशाल है। इस तरह ये प्रत्येक दिशामें निवास करते हैं ॥ ३४-३५ ॥
एतेषां कीर्तनं कृत्वा सर्वपापात् प्रमुच्यते ।
यस्यां यस्यां दिशि ह्येते तां दिशं शरणं गतः ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यः स्वस्तिमांश्च गृहान् व्रजेत् ॥ ३६ ॥
इन सबका गुणगान करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। जिस-जिस दिशामें ये महर्षि रहते हैं, उस-उस दिशामें जानेपर जो मनुष्य इनकी शरण लेता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और कुशलपूर्वक अपने घरको पहुँच जाता है ॥ ३६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि दिशास्वस्तिकं नाम
अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें दिशास्वस्तिक नामक दो सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०८ ॥