महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1342, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुरा दानवमुख्या हि क्रोधलोभसमन्विताः । बलेन मत्ताः शतशो नरकाद्या महासुराः ॥ ७ ॥ पूर्वकालमें नरकासुर आदि सैकड़ों मुख्य-मुख्य दानव क्रोध और लोभके वशीभूत हो बलके मदसे मतवाले हो गये थे ॥ ७ ॥
तथैव चान्ये बहवो दानवा युद्धदुर्मदाः । न सहन्ते स्म देवानां समृद्धिं तामनुत्तमाम् ॥ ८ ॥ इनके सिवा और भी बहुत-से रणदुर्मद दानव थे, जो देवताओंकी उत्तम समृद्धिको सहन नहीं कर पाते थे ॥
दानवैरर्द्यमानास्तु देवा देवर्षयस्तथा । न शर्म लेभिरे राजन् विशमानास्ततस्ततः ॥ ९ ॥ राजन्! उन दानवोंसे पीड़ित हो देवता और देवर्षि कहीं चैन नहीं पाते थे। वे इधर-उधर लुकते-छिपते फिरते थे ॥ ९ ॥
पृथिवीमार्तरूपां ते समपश्यन् दिवौकसः । दानवैरभिसंस्तीर्णां घोररूपैर्महाबलैः ॥ १० ॥ समूचे भूमण्डलमें भयानक रूपधारी महाबली दानव फैल गये थे। देवताओंने देखा, यह पृथ्वी दानवोंके पापभारसे पीड़ित एवं आर्त हो उठी है ॥ १० ॥
भारार्तामप्रहृष्टां च दुःखितां संनिमज्जतीम् । अथादितेयाः संत्रस्ता ब्रह्माणमिदमब्रुवन् ॥ ११ ॥ यह भारसे व्याकुल, हर्ष और उल्लाससे शून्य तथा दुखी हो रसातलमें डूब रही है। यह देखकर अदितिके सभी पुत्र भयसे थर्रा उठे और ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले— ॥ ११ ॥
कथं शक्ष्यामहे ब्रह्मन् दानवैरभिमर्दनम् । स्वयम्भूस्तानुवाचेदं निसृष्टोऽत्र विधिर्मया ॥ १२ ॥ ‘ब्रह्मन्! दानवलोग जो हमें इस प्रकार रौंद रहे हैं, इसे हम किस प्रकार सह सकेंगे?' तब स्वयम्भू ब्रह्माने उनसे इस प्रकार कहा—'देवताओ! इस विपत्तिको दूर करनेके लिये मैंने उपाय कर दिया है ॥ १२ ॥
ते वरेणाभिसम्पन्ना बलेन च मदेन च । नावबुध्यन्ति सम्मूढा विष्णुमव्यक्तदर्शनम् ॥ १३ ॥ वराहरूपिणं देवमधृष्यममरैरपि । ‘वे दानव वर पाकर बल और अभिमानसे मत्त हो उठे हैं। वे मूढ़ दैत्य अव्यक्तस्वरूप भगवान् विष्णुको नहीं जानते, जो देवताओंके लिये भी दुर्धर्ष हैं। उन्होंने वाराह रूप धारण कर रखा है ॥ १३ १/२ ॥
एष वेगेन गत्वा हि यत्र ते दानवाधमाः ॥ १४ ॥ अन्तर्भूमिगता घोरा निवसन्ति सहस्रशः ।