महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभगवान्के ऐसा कहनेपर नारदजी हाथ जोड़ प्रणाम करके खड़े हो गये और उन सर्वदेवेश्वर सर्वात्मा एवं पापहारी प्रभु श्रीविष्णुसे बोले।।
नारद उवाच
अव्यक्तं शाश्वतं देवं प्रभवं पुरुषोत्तमम् ।।
प्रपद्ये प्राञ्जलिर्विष्णुमक्षरं परमं पदम् ।
**नारदजीने कहा—**प्रभो! जो अव्यक्त सनातन देवता, सबकी उत्पत्तिके कारण, पुरुषोत्तम, अविनाशी और परम पदस्वरूप हैं, उन भगवान् विष्णुकी मैं हाथ जोड़कर शरण लेता हूँ।।
पुराणं प्रभवं नित्यमक्षयं लोकसाक्षिणम् ।।
प्रपद्ये पुण्डरीकाक्षमीशं भक्तानुकम्पिनम् ।
जो पुराणपुरुष, सबकी उत्पत्तिके कारण, नित्य, अक्षय और सम्पूर्ण जगत्के साक्षी हैं, जिनके नेत्र कमलके समान सुन्दर हैं, उन भक्तवत्सल भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ।।
लोकनाथं सहस्राक्षमद्भुतं परमं पदम् ।।
भगवन्तं प्रपन्नोऽस्मि भूतभव्यभवत्प्रभुम् ।
जो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी तथा संरक्षक हैं, जिनके सहस्रों नेत्र हैं; तथा जो भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी हैं, उन अद्भुत परमपदरूप भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ।।
स्रष्टारं सर्वलोकानामनन्तं विश्वतोमुखम् ।।
पद्मनाभं हृषीकेशं प्रपद्ये सत्यमच्युतम् ।
समस्त लोकोंके स्रष्टा और सब ओर मुखवाले, अनन्त, सत्य, अच्युत एवं सम्पूर्ण इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् पद्मनाभकी मैं शरण लेता हूँ।।
हिरण्यगर्भममृतं भूगर्भं परतः परम् ।।
प्रभोः प्रभुमनाद्यन्तं प्रपद्ये तं रविप्रभम् ।
जो हिरण्यगर्भ, अमृतस्वरूप, पृथ्वीको गर्भमें धारण करनेवाले, परात्पर तथा प्रभुओंके भी प्रभु हैं, उन अनादि, अनन्त तथा सूर्यके समान कान्तिवाले भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ।।
सहस्रशीर्षं पुरुषं महर्षिं तत्त्वभावनम् ।।
प्रपद्ये सूक्ष्ममचलं वरेण्यमभयप्रदम् ।
जिनके सहस्रों मस्तक हैं, जो अन्तर्यामी आत्मा हैं, तत्त्वोंका चिन्तन करनेवाले महर्षि कपिलस्वरूप हैं, उन सूक्ष्म, अचल, वरेण्य और अभयप्रद भगवान् श्रीहरिकी शरण लेता हूँ।।
नारायणं पुराणर्षिं योगात्मानं सनातनम् ।।