महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयोगके आवासस्थान! आपको नमस्कार है। सबके निवासस्थान, वरदायक, यज्ञगर्भ, सुनहरे रंगोंवाले पञ्चयज्ञमय परमेश्वर! आपको नमस्कार है॥ चतुर्मूर्ते परं धाम लक्ष्म्यावास परार्चित । सर्वावास नमस्तेऽस्तु वासुदेव प्रधानकृत् ॥ आप श्रीकृष्ण, बलभद्र, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार रूपोंवाले, परमधामस्वरूप, लक्ष्मीनिवास, परमपूजित, सबके आवासस्थान और प्रकृतिके भी प्रवर्तक हैं। वासुदेव! आपको नमस्कार है॥ अजस्त्वमगमः पन्था ह्यमूर्तिर्विश्वमूर्तिधृक् । विकर्तः पञ्चकालज्ञ नमस्ते ज्ञानसागर ॥ आप अजन्मा हैं, अगम्य मार्ग हैं, निराकार हैं अथवा जगत्के सम्पूर्ण आकार आप ही धारण करते हैं, आप ही संहारकारी रुद्र हैं। आप प्रातः, सङ्गव, मध्याह्न, अपराह्न और सायाह्न—इन पाँच कालोंको जाननेवाले हैं। ज्ञानसागर! आपको नमस्कार है॥ अव्यक्ताद् व्यक्तमुत्पन्नं व्यक्ताद् यस्तु परोऽक्षरः । यस्मात् परतरं नास्ति तमस्मि शरणं गतः ॥ जिन अव्यक्त परमात्मासे इस व्यक्त जगत्की उत्पत्ति हुई है, जो व्यक्तसे परे और अविनाशी हैं, जिनसे उत्कृष्ट दूसरी कोई वस्तु नहीं है, उन भगवान् विष्णुकी मैं शरणमें आया हूँ॥ न प्रधानो न च महान् पुरुषश्चेतनो ह्यजः । अनयोर्यः परतरः तमस्मि शरणं गतः ॥ प्रकृति और महत्तत्त्व—ये दोनों जड हैं। पुरुष चेतन और अजन्मा है। इन दोनों क्षर और अक्षर पुरुषोंसे जो उत्कृष्ट और विलक्षण हैं, उन भगवान् पुरुषोत्तमकी मैं शरण लेता हूँ॥ चिन्तयन्तो हि यं नित्यं ब्रह्मेशानादयः प्रभुम् । निश्चयं नाधिगच्छन्ति तमस्मि शरणं गतः ॥ ब्रह्मा और शिव आदि देवता जिन भगवान्का सदा चिन्तन करते रहनेपर भी उनके स्वरूपके सम्बन्धमें किसी निश्चयतक नहीं पहुँच पाते, उन परमेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ॥ जितेन्द्रिया महात्मानो ज्ञानध्यानपरायणाः । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तमस्मि शरणं गतः ॥ ज्ञानी और ध्यानपरायण जितेन्द्रिय महात्मा जिन्हें पाकर फिर इस संसारमें नहीं लौटते हैं, उन भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ॥ एकांशेन जगत् सर्वमवष्टभ्य विभुः स्थितः । अग्राह्यो निर्गुणो नित्यस्तमस्मि शरणं गतः ॥