महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1356, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशेन्द्रियाणि मनसि अहङ्कारे तथा मनः ॥ अहङ्कारं तथा बुद्धौ बुद्धिमात्मनि योजयेत् । साधक पाँच कर्मेन्द्रियों तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियोंको संयममें रखकर उन दसों इन्द्रियोंको मनमें विलीन करे। मनको अहंकारमें, अहंकारको बुद्धिमें और बुद्धिको आत्मामें लगावे ॥
यतबुद्धीन्द्रियः पश्यन् बुद्ध्या बुद्धयेत् परात्परम् । ममायमिति यस्याहं येन सर्वमिदं ततम् । पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको संयममें रखकर बुद्धिके द्वारा परात्पर परमात्माका अनुभव करे कि यह परमेश्वर मेरा है और मैं इसका हूँ, तथा इसीने इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है ॥
आत्मनाऽऽत्मनि संयोज्य परमात्मान्यनुस्मरेत् ॥ ततो बुद्धेः परं बुद्ध्वा लभते न पुनर्भवम् । मरणे समनुप्राप्ते यश्चैवं मामनुस्मरेत् ॥ अपि पापसमाचारः स याति परमां गतिम् । स्वयं ही अपने-आपको परमात्माके ध्यानमें लगाकर निरन्तर उनका स्मरण करे, तदनन्तर बुद्धिसे भी परे परमात्माको जानकर मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जो मृत्युकाल आनेपर इस प्रकार मेरा स्मरण करता है, वह पुरुष पहलेका पापाचारी रहा हो तो भी परम गतिको प्राप्त होता है ॥
ओं नमो भगवते तस्मै देहिनां परमात्मने ॥ नारायणाय भक्तानामेकनिष्ठाय शाश्वते । समस्त देहधारियोंके परमात्मा तथा भक्तोंके प्रति एकमात्र निष्ठा रखनेवाले उन सनातन भगवान् नारायणको नमस्कार है ॥
इमामनुस्मृतिं दिव्यां वैष्णवीं सुसमाहितः ॥ स्वपन् विबुध्यंश्च पठन् यत्र तत्र समभ्यसेत् । यह दिव्य वैष्णवी-अनुस्मृति विद्या है। मनुष्य एकाग्रचित्त होकर सोते, जागते और स्वाध्याय करते समय जहाँ कहीं भी इसका जप करता रहे ॥
पौर्णमास्याममायां च द्वादश्यां च विशेषतः ॥ श्रावयेच्छ्रद्दधानांश्च मद्भक्तांश्च विशेषतः । पूर्णिमा, अमावास्या तथा विशेषतः द्वादशी तिथिको मेरे श्रद्धालु भक्तोंको इसका श्रवण करावे ॥
यद्यहङ्कारमाश्रित्य यज्ञदानतपःक्रियाः ॥ कुर्वंस्तत्फलमाप्नोति पुनरावर्तनं तु तत् । यदि कोई अहंकारका आश्रय लेकर यज्ञ, दान और तपरूप कर्म करे तो उसका फल उसे मिलता है। परंतु वह आवागमनके चक्करमें डालनेवाला होता है ॥