महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1361, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंऔर आप भी कहाँसे आये हैं? यह भलीभाँति समझाकर बताइये। इसके सिवा जो परम तत्त्व है, उसका भी विवेचन कीजिये ॥ ५ ॥
कथं च सर्वभूतेषु समेषु द्विजसत्तम ।
सम्यग्वृत्ता निवर्तन्ते विपरीताः क्षयोदयाः ॥ ६ ॥
'द्विजश्रेष्ठ! पृथ्वी आदि सम्पूर्ण महाभूत सर्वत्र समान हैं; सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर उन्हींसे निर्मित हुए हैं तो भी उनमें क्षय और वृद्धि—ये दोनों विपरीतभाव क्यों होते हैं? ॥ ६ ॥
वेदेषु चापि यद् वाक्यं लौकिकं व्यापकं च यत् ।
एतद् विद्वन् यथातत्त्वं सर्वं व्याख्यातुमर्हसि ॥ ७ ॥
'वेदों और स्मृतियोंमें भी जो लौकिक और व्यापक धर्मोंका वर्णन है, उनमें भी विषमता है। अतः विद्वन्! इन सबकी आप यथार्थरूपसे व्याख्या करें' ॥ ७ ॥
गुरुरुवाच
शृणु शिष्य महाप्राज्ञ ब्रह्मगुह्यमिदं परम् ।
अध्यात्मं सर्वविद्यानामागमानां च यद्वसु ॥ ८ ॥
**गुरुने कहा—**वत्स! सुनो। महामते! तुमने जो बात पूछी है, वह वेदोंका उत्तम एवं गूढ़ रहस्य है। यही अध्यात्मतत्त्व है तथा यही समस्त विद्याओं और शास्त्रोंका सर्वस्व है ॥ ८ ॥
वासुदेवः परमिदं विश्वस्य ब्रह्मणो मुखम् ।
सत्यं ज्ञानमथो यज्ञस्तितिक्षा दम आर्जवम् ॥ ९ ॥
सम्पूर्ण वेदका मुख जो प्रणव है वह तथा सत्य, ज्ञान, यज्ञ, तितिक्षा, इन्द्रिय-संयम, सरलता और परम तत्त्व—यह सब कुछ वासुदेव ही है ॥ ९ ॥
पुरुषं सनातनं विष्णुं यं तं वेदविदो विदुः ।
स्वर्गप्रलयकर्तारमव्यक्तं ब्रह्म शाश्वतम् ॥ १० ॥
वेदज्ञजन उसीको सनातन पुरुष और विष्णु भी मानते हैं। वही संसारकी सृष्टि और प्रलय करनेवाला अव्यक्त एवं सनातन ब्रह्म है ॥ १० ॥
तदिदं ब्रह्म वार्ष्णेयमितिहासं शृणुष्व मे ।
ब्राह्मणो ब्राह्मणैः श्राव्यो राजन्यः क्षत्रियैस्तथा ॥ ११ ॥
वैश्यो वैश्यैस्तथा श्राव्यः शूद्रः शूद्रैर्महामनाः ।
माहात्म्यं देवदेवस्य विष्णोरमिततेजसः ॥ १२ ॥
वही ब्रह्म वृष्णिकुलमें श्रीकृष्णरूपमें अवतीर्ण हुआ, इस कथाको तुम मुझसे सुनो। ब्राह्मण ब्राह्मणको, क्षत्रिय क्षत्रियको, वैश्य वैश्यको तथा शूद्र महामनस्वी शूद्रको, अमित तेजस्वी देवाधिदेव विष्णुका माहात्म्य सुनावे ॥ ११-१२ ॥
अर्हस्त्वमसि कल्याणं वार्ष्णेयं शृणु यत्परम् ।