भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1363

उस समय स्वयं भगवान् ब्रह्माको वेदोंका, बृहस्पतिजीको वेदांगोंका और शुक्राचार्यको नीति-शास्त्रका ज्ञान हुआ तथा उन लोगोंने जगत्के हितके लिये उन सब विषयोंका उपदेश किया ॥ २० ॥ गान्धर्वं नारदो वेद भरद्वाजो धनुर्ग्रहम् । देवर्षिचरितं गार्ग्यः कृष्णात्रेयश्चिकित्सितम् ॥ २१ ॥ नारदजीको गान्धर्व वेदका, भरद्वाजको धनुर्वेदका, महर्षि गार्ग्यको देवर्षियोंके चरित्रका तथा कृष्णात्रेयको चिकित्साशास्त्रका ज्ञान हुआ ॥ २१ ॥ न्यायतन्त्राण्यनेकानि तैस्तैरुक्तानि वादिभिः । हेत्वागमसदाचारैर्यद्युक्तं तदुपास्यताम् ॥ २२ ॥ तर्कशील विद्वानोंने तर्कशास्त्रके अनेक ग्रन्थोंका प्रणयन किया। उन महर्षियोंने युक्तियुक्त शास्त्र और सदाचारके द्वारा जिस ब्रह्मका उपदेश किया है, उसीकी तुम भी उपासना करो ॥ २२ ॥ अनाद्यं तत्परं ब्रह्म न देवा नर्षयो विदुः । एकस्तद् वेद भगवान् धाता नारायणः प्रभुः ॥ २३ ॥ वह परब्रह्म अनादि और सबसे परे है। उसे न देवता जानते हैं न ऋषि। उसे तो एकमात्र जगत्पालक नारायण ही जानते हैं ॥ २३ ॥ नारायणादृषिगणास्तथा मुख्याः सुरासुराः । राजर्षयः पुराणाश्च परमं दुःखभेषजम् ॥ २४ ॥ नारायणसे ही ऋषियों, मुख्य-मुख्य देवताओं, असुरों तथा प्राचीन राजर्षियोंने उस ब्रह्मको जाना है; वह ब्रह्म-ज्ञान ही समस्त दुःखोंका परम औषध है ॥ २४ ॥ पुरुषाधिष्ठितान् भावान् प्रकृतिः सूयते यदा । हेतुयुक्तमतः पूर्वं जगत् सम्परिवर्तते ॥ २५ ॥ पुरुषद्वारा संकल्पमें लाये गये विविध पदार्थोंकी रचना प्रकृति ही करती है। इस प्रकृतिसे सर्वप्रथम कारणसहित जगत् उत्पन्न होता है ॥ २५ ॥ दीपादन्ये यथा दीपाः प्रवर्तन्ते सहस्रशः । प्रकृतिः सूयते तद्वदानन्त्यान् नापचीयते ॥ २६ ॥ जैसे एक दीपकसे दूसरे सहस्रों दीप जला लिये जाते हैं और पहले दीपकको कोई हानि नहीं होती, उसी प्रकार एक प्रकृति ही असंख्य पदार्थोंको उत्पन्न करती है और अनन्त होनेके कारण उसका क्षय नहीं होता ॥ अव्यक्तकर्मजा बुद्धिरहंकारं प्रसूयते । आकाशं चाप्यहंकाराद् वायुराकाशसम्भवः ॥ २७ ॥ अव्यक्त प्रकृतिमें क्षोभ होनेपर जिस बुद्धि (महत्तत्त्व) की उत्पत्ति होती है, वह बुद्धि अहंकारको जन्म देती है। अहंकारसे आकाश और आकाशसे वायुकी उत्पत्ति होती