भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1386, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1386

अहिंसा, सत्यभाषण, समस्त प्राणियोंके प्रति सरलतापूर्ण बर्ताव, क्षमा तथा प्रमादशून्यता—ये गुण जिस पुरुषमें विद्यमान हों, वही सुखी होता है ।। ६ ।। यश्चैनं परमं धर्मं सर्वभूतसुखावहम्। दुःखान्निःसरणं वेद सर्वज्ञः स सुखी भवेत् ।। ७ ।। जो मनुष्य इस अहिंसा आदि परम धर्मको समस्त प्राणियोंके लिये सुखद और दुःखनिवारक जानता है, वही सर्वज्ञ है और वही सुखी होता है ।। ७ ।। तस्मात् समाहितं बुद्ध्या मनो भूतेषु धारयेत्। नापध्यायेन्न स्पृहयेन्नाबद्धं चिन्तयेदसत् ।। ८ ।। अथामोघप्रयत्नेन मनो ज्ञाने निवेशयेत्। वाचामोघप्रयासेन मनोजं तत् प्रवर्तते ।। ९ ।। इसलिये बुद्धिके द्वारा मनको समाहित करके समस्त प्राणियोंमें स्थित परमात्मामें लगावे। किसीका अहित न सोचे, असम्भव वस्तुकी कामना न करे, मिथ्या पदार्थोंकी चिन्ता न करे और सफल प्रयत्न करके मनको ज्ञानके साधनमें लगा दे। वेदान्त-वाक्योंके श्रवण तथा सुदृढ़ प्रयत्नसे उत्तम ज्ञानकी प्राप्ति होती है ।। विवक्षता च सद्वाक्यं धर्मं सूक्ष्ममवेक्षता। सत्यां वाचमहिंसां च वदेदनपवादिनीम् ।। १० ।। कल्कापेतामपरुषामनृशंसामपैशुनाम्। ईदृगल्पं च वक्तव्यमविक्षिप्तेन चेतसा ।। ११ ।। जो सूक्ष्म धर्मको देखता और उत्तम वचन बोलना चाहता हो, उसको ऐसी बात कहनी चाहिये जो सत्य होनेके साथ ही हिंसा और परनिन्दासे रहित हो। जिसमें शठता, कठोरता, क्रूरता और चुगली आदि दोषोंका सर्वथा अभाव हो, ऐसी वाणी भी बहुत थोड़ी मात्रामें और सुस्थिर चित्तसे बोलनी चाहिये ।। १०-११ ।। वाक्प्रबद्धो हि संसारो विरागाद् व्याहरेद् यदि। बुद्ध्याप्यनुगृहीतेन मनसा कर्म तामसम् ।। १२ ।। संसारका सारा व्यवहार वाणीसे ही बँधा हुआ है, अतः सदा उत्तम वाणी ही बोले और यदि वैराग्य हो तो बुद्धिके द्वारा मनको वशमें करके अपने किये हुए हिंसादि तामस कर्मोंको भी लोगोंसे कह दे (क्योंकि प्रकाशित कर देनेसे पापकी मात्रा घट जाती है) ।। १२ ।। रजोभूतैर्हि करणैः कर्मणि प्रतिपद्यते। स दुःखं प्राप्य लोकेऽस्मिन् नरकायोपपद्यते। तस्मान्मनोवाक्शरीरैराचरेद् धैर्यमात्मनः ।। १३ ।। रजोगुणसे प्रभावित हुई इन्द्रियोंकी प्रेरणासे मनुष्य विषयभोगरूप कर्मोंमें प्रवृत्त होता है और इस लोकमें दुःख भोगकर अन्तमें नरकगामी होता है। अतः मन, वाणी और शरीरद्वारा ऐसा कार्य करे जिससे अपनेको धैर्य प्राप्त हो ।। १३ ।।