भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1391

वर्णन करते हैं, उनका वह वर्णन युक्तिसंगत भी है ।। ५ ।। इन्द्रियाणां श्रमात् स्वप्नमाहुः सर्वगतं बुधाः । मनसस्त्वप्रलीनत्वात् तत् तदाहुर्निदर्शनम् ।। ६ ।। विद्वान् महर्षियोंका कहना है कि जाग्रत्-अवस्थामें निरन्तर शब्द आदि विषयोंको ग्रहण करते-करते श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ जब थक जाती हैं, तब सभी प्राणियोंके अनुभवमें आनेवाला स्वप्न दिखायी देने लगता है। उस समय इन्द्रियोंके लय होनेपर भी मनका लय नहीं होता है; इसलिये वह समस्त विषयोंका जो मनसे अनुभव करता है, वही स्वप्न कहलाता है। इस विषयमें प्रसिद्ध दृष्टान्त बताया जाता है ।। ६ ।। कार्ये व्यासक्तमनसः संकल्पो जाग्रतो ह्यपि । यद्वन्मनोरथैश्वर्यं स्वप्ने तद्वन्मनोगतम् ।। ७ ।। जैसे जाग्रत्-अवस्थामें विभिन्न कार्योंमें आसक्त-चित्त हुए मनुष्यके संकल्प मनोराज्यकी ही विभूति हैं, उसी प्रकार स्वप्नके भाव भी मनसे ही सम्बन्ध रखते हैं ।। ७ ।। संस्काराणामसंख्यानां कामात्मा तदवाप्नुयात् । मनस्यन्तर्हितं सर्वं स वेदोत्तमपूरुषः ।। ८ ।। कामनाओंमें जिसका मन आसक्त है, वह पुरुष स्वप्नमें असंख्य संस्कारोंके अनुसार अनेक दृश्योंको देखता है। वे समस्त संस्कार उसके मनमें ही छिपे रहते हैं, जिन्हें वह सर्वश्रेष्ठ अन्तर्यामी पुरुष परमात्मा जानता है ।। ८ ।। गुणानामपि यद्येतत् कर्मणा चाप्युपस्थितम् । तत् तत् शंसन्ति भूतानि मनो यद्भावितं यथा ।। ९ ।। कर्मोंके अनुसार सत्त्वादि गुणोंमेंसे यदि यह सत्त्व, रज या तम जो कोई भी गुण प्राप्त होता है, उससे मनपर जब जैसे संस्कार पड़ते हैं अथवा जब जिस कर्मसे मन भावित होता है, उस समय सूक्ष्मभूत स्वप्नमें वैसे ही आकार प्रकट कर देते हैं ।। ९ ।। ततस्तमुपसर्पन्ति गुणा राजसतामसाः । सात्त्विका वा यथायोगमानन्तर्यफलोदयम् ।। १० ।। उस स्वप्नका दर्शन होते ही सात्त्विक, राजस अथवा तामस गुण यथायोग्य सुख-दुःखरूप फलका अनुभव करानेके लिये उसके पास आ पहुँचते हैं ।। १० ।। ततः पश्यन्त्यसम्बुद्ध्या वातपित्तकफोत्तरान् । रजस्तमोगतैर्भावैस्तदप्याहुर्दुरत्ययम् ।। ११ ।। तदनन्तर मनुष्य स्वप्नमें अज्ञानवश वात, पित्त या कफकी प्रधानतासे युक्त तथा काम, मोह आदि राजस, तामस भावोंसे व्याप्त नाना प्रकारके शरीरोंका दर्शन करते हैं। तत्त्वज्ञान हुए बिना उस स्वप्नदर्शनको लाँघना अत्यन्त कठिन बताया गया है ।। ११ ।। प्रसन्नैरिन्द्रियैर्यद् यत् संकल्पयति मानसम् । तत् तत् स्वप्नेऽप्युपगते मनो हृष्यन्निरीक्षते ।। १२ ।।