भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 142

यो हि राज्ये स्थितः शश्वद् वशी तुल्यप्रियाप्रियः ॥ १३ ॥ क्षत्रियो यज्ञशिष्टाशी राजा शास्त्रार्थतत्त्ववित् । असाधुनिग्रहरतः साधूनां प्रग्रहे रतः ॥ १४ ॥ धर्मवर्त्मनि संस्थाप्य प्रजा वर्तेत धर्मतः । पुत्रसंक्रामितश्रीश्च वने वन्येन वर्तयन् ॥ १५ ॥ विधिना श्रावणेनैव कुर्यात् कर्माण्यतन्द्रितः । य एवं वर्तते राजन् स राजा धर्मनिश्चितः ॥ १६ ॥ कुन्तीनन्दन! अतः तुम भी प्रयत्नपूर्वक इस धर्मका पालन करो। जो क्षत्रियनरेश राज्यसिंहासनपर स्थित हो अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको सदा अपने अधीन रखता है, प्रिय और अप्रियको समानदृष्टिसे देखता है, यज्ञसे बचे हुए अन्नका भोजन करता है, शास्त्रोंके यथार्थ रहस्यको जानता है, दुष्टोंका दमन और साधु पुरुषोंका पालन करता है, समस्त प्रजाको धर्मके मार्गमें स्थापित करके स्वयं भी धर्मानुकूल बर्ताव करता है, वृद्धावस्थामें राजलक्ष्मीको पुत्रके अधीन करके वनमें जाकर जंगली फल-मूलोंका आहार करते हुए जीवन बिताता है तथा वहाँ भी शास्त्र-श्रवणसे ज्ञात हुए शास्त्रविहित कर्मोंका आलस्य छोड़कर पालन करता है, ऐसा बर्ताव करनेवाला वह राजा ही धर्मको निश्चितरूपसे जानने और माननेवाला है ॥

तस्यायं च परश्चैव लोकः स्यात् सफलोदयः । निर्वाणं हि सुदुष्प्राप्यं बहुविघ्नं च मे मतम् ॥ १७ ॥ उसका यह लोक और परलोक दोनों सफल हो जाते हैं, मेरा यह विश्वास है कि संन्यासके द्वारा निर्वाण प्राप्त करना अत्यन्त दुष्कर एवं दुर्लभ है; क्योंकि उसमें बहुत-से विघ्न आते हैं ॥ १७ ॥

एवं धर्ममनुकान्ताः सत्यदानतपःपराः । आनृशंस्यगुणैर्युक्ताः कामक्रोधविवर्जिताः ॥ १८ ॥ प्रजानां पालने युक्ता धर्ममुत्तममास्थिताः । गोब्राह्मणार्थे युध्यन्तः प्राप्ता गतिमनुत्तमाम् ॥ १९ ॥ इस प्रकार धर्मका अनुसरण करनेवाले, सत्य, दान और तपमें संलग्न रहनेवाले, दया आदि गुणोंसे युक्त, काम-क्रोध आदि दोषोंसे रहित, प्रजापालन-परायण, उत्तम धर्मसेवी तथा गौओं और ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये युद्ध करनेवाले नरेशोंने परम उत्तम गति प्राप्त की है ॥ १८-१९ ॥

एवं रुद्राः सवसवस्तथाऽऽदित्याः परंतप । साध्या राजर्षिसंघाश्च धर्ममेतं समाश्रिताः । अप्रमत्तास्ततः स्वर्गं प्राप्ताः पुण्यैः स्वकर्मभिः ॥ २० ॥