भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1458

तस्माच्छक्र न शोचामि सर्वं ह्येवेदमन्तवत् ॥ २८ ॥
इन्द्र! मैं धर्मकी पूरी-पूरी विधि तथा सम्पूर्ण भूतोंकी अनित्यताको जानता हूँ। इसलिये, ‘यह सब नाशवान् है’ ऐसा समझकर किसीके लिये शोक नहीं करता ॥ २८ ॥
निर्ममो निरहंकारो निराशीर्मुक्तबन्धनः ।
स्वस्थो व्यपेतः पश्यामि भूतानां प्रभवाप्ययौ ॥ २९ ॥
ममता, अहंकार तथा कामनाओंसे शून्य और सब प्रकारके बन्धनोंसे रहित हो आत्मनिष्ठ एवं असंग रहकर मैं प्राणियोंकी उत्पत्ति और विनाशको सदा देखता रहता हूँ ॥ २९ ॥
कृतप्रज्ञस्य दान्तस्य वितृष्णस्य निराशिषः ।
नायासो विद्यते शक्र पश्यतो लोकमव्ययम् ॥ ३० ॥
इन्द्र! मैं शुद्ध-बुद्धि तथा मन और इन्द्रियोंको अपने अधीन करके स्थित हूँ। मैं तृष्णा और कामनासे रहित हूँ और सदा अविनाशी आत्मापर ही दृष्टि रखता हूँ, इसलिये मुझे कभी कष्ट नहीं होता ॥ ३० ॥
प्रकृतौ च विकारे च न मे प्रीतिर्न च द्विषे ।
द्वेष्टारं च न पश्यामि यो मामद्य ममायते ॥ ३१ ॥
प्रकृति और उसके कार्योंके प्रति मेरे मनमें न तो राग है, न द्वेष। मैं किसीको न अपना द्वेषी समझता हूँ और न आत्मीय ही मानता हूँ ॥ ३१ ॥
नोर्ध्वं नावाङ् न तिर्यक् च न क्वचिच्छक्र कामये ।
न हि ज्ञेये न विज्ञाने न ज्ञाने कर्म विद्यते ॥ ३२ ॥
इन्द्र! मुझे ऊपर (स्वर्गकी), नीचे (पातालकी) तथा बीचके लोक (मर्त्यलोक) की भी कभी कामना नहीं होती। ज्ञान-विज्ञान और ज्ञेयके निमित्त भी मेरे लिये कोई कर्म आवश्यक नहीं है ॥ ३२ ॥

शक्र उवाच
येनैषा लभ्यते प्रज्ञा येन शान्तिरवाप्यते ।
प्रब्रूहि तमुपायं मे सम्यक् प्रह्राद पृच्छतः ॥ ३३ ॥
इन्द्रने कहा—प्रह्लादजी! जिस उपायसे ऐसी बुद्धि और इस तरहकी शान्ति प्राप्त होती है, उसे पूछता हूँ। आप मुझे अच्छी तरह उसे बताइये ॥ ३३ ॥

प्रह्राद उवाच
आर्जवेनाप्रमादेन प्रसादेनात्मवत्तया ।
वृद्धशुश्रूषया शक्र पुरुषो लभते महत् ॥ ३४ ॥
प्रह्लादने कहा—इन्द्र! सरलता, सावधानी, बुद्धिकी निर्मलता, चित्तकी स्थिरता तथा बड़े-बूढ़ोंकी सेवा करनेसे पुरुषको महत्-पदकी प्राप्ति होती है ॥ ३४ ॥
स्वभावाल्लभते प्रज्ञां शान्तिमेति स्वभावतः ।