भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

इन्द्र और बलिका संवाद—इन्द्रके आक्षेपयुक्त वचनोंका बलिके द्वारा कठोर प्रत्युत्तर

युधिष्ठिर उवाच

यथा बुद्ध्या महीपालो भ्रष्टश्रीर्विचरेन्महीम् ।
कालदण्डविनिष्पिष्टस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! जो राजलक्ष्मीसे भ्रष्ट हो गया हो और कालके दण्डसे पिस गया हो, वह भूपाल किस बुद्धिसे इस पृथ्वीपर विचरे, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
वासवस्य च संवादं बलेर्वैरोचनस्य च ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार मनुष्य विरोचनकुमार बलि और इन्द्रके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥

पितामहमुपागम्य प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ।
सर्वानिवासुरान् जित्वा बलिं पप्रच्छ वासवः ॥ ३ ॥
एक समय इन्द्र समस्त असुरोंपर विजय पाकर पितामह ब्रह्माजीके पास गये और हाथ जोड़कर प्रणाम करके उन्होंने पूछा—'भगवन्! बलि कहाँ रहता है?' ॥ ३ ॥

यस्य स्म ददतो वित्तं न कदाचन हीयते ।
तं बलिं नाधिगच्छामि ब्रह्मन्नाचक्ष्व मे बलिम् ॥ ४ ॥
'ब्रह्मन्! जिसके दान देते समय उसके धनका भण्डार कभी खाली नहीं होता था, उस राजा बलिको मैं ढूँढ़नेपर भी नहीं पा रहा हूँ। आप मुझे बलिका पता बताइये ॥ ४ ॥

स वायुर्वरुणश्चैव स रविः स च चन्द्रमाः ।
सोऽग्निस्तपति भूतानि जलं च स भवत्युत ॥ ५ ॥
तं बलिं नाधिगच्छामि ब्रह्मन्नाचक्ष्व मे बलिम् ।
'वह राजा बलि ही वायु बनकर चलता, वरुण बनकर वर्षा करता, सूर्य और चन्द्रमा बनकर प्रकाश करता, अग्नि बनकर समस्त प्राणियोंको ताप देता तथा जल बनकर सबकी प्यास बुझाता था, उसी राजा बलिको मैं कहीं नहीं पा रहा हूँ। ब्रह्मन्! आप मुझे बलिका पता बताइये ॥ ५ १/२ ॥

स एव ह्यस्तमयते स स्म विद्योतते दिशः ॥ ६ ॥
स वर्षति स्म वर्षाणि यथाकालमतन्द्रितः ।