भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1463

तुमने बहुत वर्षोंतक राजलक्ष्मीसे सुशोभित हो विहारमें समय बिताया है। उस समय सुवर्णकी-सी कान्तिवाली सहस्रों देवांगनाएँ जो सब-की-सब पद्ममालाओंसे अलंकृत होती थीं, तुम्हारे सामने नृत्य किया करती थीं। दानवराज! उन दिनों तुम्हारे मनकी क्या अवस्था थी और अब कैसी है? ।। १९-२०१/२ ।।

छत्रं तवासीत् सुमहत् सौवर्णं रत्नभूषितम् ।। २१ ।।
ननृतुस्तत्र गन्धर्वाः षट् सहस्राणि सप्तधा ।
एक समय था, जब कि तुम्हारे ऊपर सोनेका बना हुआ रत्नभूषित विशाल छत्र तना रहता था और छः हजार गन्धर्व सप्त स्वरोंमें गीत गाते हुए तुम्हारे सम्मुख अपनी नृत्यकलाका प्रदर्शन करते थे ।। २११/२ ।।

यूपस्तवासीत् सुमहान् यजतः सर्वकाञ्चनः ।। २२ ।।
यत्राददः सहस्राणि अयुतानां गवां दश ।
अनन्तरं सहस्रेण तदाऽऽसीद् दैत्य का मतिः ।। २३ ।।
यज्ञ करते समय तुम्हारे यज्ञमण्डपका अत्यन्त विशाल मध्यवर्ती स्तम्भ पूरा-का-पूरा सोनेका बना होता था। जिस समय तुम निरन्तर दस-दस करोड़ गौओंका सहस्रों बार दान किया करते थे, दैत्यराज! उस समय तुम्हारे मनमें कैसे विचार उठते रहे होंगे? ।। २२-२३ ।।

यदा च पृथिवीं सर्वां यजमानोऽनुपर्यगाः ।
शम्याक्षेपेण विधिना तदाऽऽसीत् किं तु ते हृदि ।। २४ ।।
जब तुमने शम्याक्षेपकी* विधिसे यज्ञ करते हुए सारी पृथ्वीकी परिक्रमा की थी, उस समय तुम्हारे हृदयमें कितना उत्साह रहा होगा? ।। २४ ।।

न ते पश्यामि भृङ्गारं न च्छत्रं व्यजने न च ।
ब्रह्मदत्तां च ते मालां न पश्याम्यसुराधिप ।। २५ ।।
असुरराज! अब तो मैं तुम्हारे पास न तो सोनेकी झारी, न छत्र और न चँवर ही देखता हूँ तथा ब्रह्माजीकी दी हुई वह दिव्य माला भी तुम्हारे गलेमें नहीं दिखायी देती है ।।

(भीष्म उवाच

ततः प्रहस्य स बलिर्वासवेन समीरितम् ।
निशम्य भावगम्भीरं सुरराजमथाब्रवीत् ।।
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इन्द्रकी कही हुई वह भावगम्भीर वाणी सुनकर राजा बलि हँस पड़े और देवराजसे इस प्रकार बोले ।।

बलिरुवाच

अहो हि तव बालिश्यमिह देवगणाधिप ।
अयुक्तं देवराजस्य तव कत्थमिदं वचः ।।)