महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1476, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें**तब इन्द्रने पूछा—**पवित्र मुसकानवाली सुन्दरी! बलिके शरीरसे निकलकर खड़ी हुई तुम कौन हो? तुम्हारी चमक-दमक अद्भुत है। तुम्हारी वेणी भी अत्यन्त सुन्दर है। मैं तुम्हें जानता नहीं हूँ; इसलिये पूछता हूँ। तुम मुझे अपना नाम बताओ। सुभ्रू! दैत्यराजको त्यागकर अपने तेजसे मुझे प्रकाशित करती हुई इस प्रकार तुम कौन खड़ी हो? मेरे प्रश्नके अनुसार अपना परिचय दो ।। ५-६ ।।
श्रीरुवाच
न मां विरोचनो वेद नायं वैरोचनो बलिः । आहुर्मां दुःसहेत्येवं विधित्सेति च मां विदुः ।। ७ ।। **लक्ष्मी बोली—**मुझे न तो विरोचन जानता है और न उसका पुत्र यह बलि। लोग मुझे दुःसहा कहते हैं और कुछ लोग मुझे विधित्साके नामसे भी जानते हैं ।। भूतिर्लक्ष्मीति मामाहुः श्रीरित्येवं च वासव । त्वं मां शक्र न जानीषे सर्वे देवा न मां विदुः ।। ८ ।। वासव! जानकार मनुष्य मुझे भूति, लक्ष्मी और श्री भी कहते हैं। शक्र! तुम मुझे नहीं जानते तथा सम्पूर्ण देवताओंको भी मेरे विषयमें कुछ भी ज्ञान नहीं है ।। ८ ।।
शक्र उवाच
किमिदं त्वं मम कृते उताहो बलिनः कृते । दुःसहे विजहास्येनं चिरसंवासिनी सती ।। ९ ।। **इन्द्रने पूछा—**दुःसहे! तुमने चिरकालतक राजा बलिके शरीरमें निवास किया है, अब क्या तुम मेरे लिये अथवा बलिके ही हितके लिये इनका त्याग कर रही हो? ।। ९ ।।
श्रीरुवाच
नो धाता न विधाता मां विदधाति कथंचन । कालस्तु शक्र पर्यागान्मैनं शक्रावमन्यथाः ।। १० ।। **लक्ष्मीने कहा—**इन्द्र! धाता या विधाता किसी प्रकार भी मुझे किसी कार्यमें नियुक्त नहीं कर सकते हैं; किंतु कालका ही आदेश मुझे मानना पड़ता है। वही काल इस समय बलिका परित्याग करनेके लिये मुझे प्रेरित करनेके निमित्त उपस्थित हुआ है। इन्द्र! तुम उस कालकी अवहेलना न करना ।। १० ।।
शक्र उवाच
कथं त्वया बलिस्त्यक्तः किमर्थं वा शिखण्डिनि । कथं च मां न जहास्त्वं तन्मे ब्रूहि शुचिस्मिते ।। ११ ।। **इन्द्रने पूछा—**वेणी धारण करनेवाली लक्ष्मी! तुमने बलिका कैसे और किसलिये त्याग किया है? शुचिस्मिते! तुम मेरा त्याग किस प्रकार नहीं करोगी? यह मुझे बताओ ।। ११ ।।