महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1479, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयं शक्र पादं मे तस्मात् सुनिहितं कुरु ॥ २४ ॥
**लक्ष्मीने कहा—**इन्द्र! लो, मैंने यह पैर जलमें रख दिया। अब यह जलमें ही सुप्रतिष्ठित है। अब तुम मेरे तीसरे पैरको भलीभाँति स्थापित करो ॥ २४ ॥
शक्र उवाच
यस्मिन् वेदाश्च यज्ञाश्च यस्मिन् देवाः प्रतिष्ठिताः ।
तृतीयं पादमग्निस्ते सुधृतं धारयिष्यति ॥ २५ ॥
**इन्द्रने कहा—**देवि! जिसमें वेद, यज्ञ और सम्पूर्ण देवता प्रतिष्ठित हैं। वे अग्निदेव तुम्हारे तीसरे पैरको अच्छी तरह धारण करेंगे ॥ २५ ॥
श्रीरुवाच
एष मे निहितः पादो योऽयमग्नौ प्रतिष्ठितः ।
चतुर्थं शक्र पादं मे तस्मात् सुनिहितं कुरु ॥ २६ ॥
**लक्ष्मीने कहा—**इन्द्र! यह तीसरा पाद मैंने अग्निमें रख दिया। अब यह अग्निमें प्रतिष्ठित है। इसके बाद मेरे चौथे पादको भलीभाँति स्थापित करो ॥ २६ ॥
शक्र उवाच
ये वै सन्तो मनुष्येषु ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः ।
ते ते पादं तितिक्षन्तामलं सन्तस्तितिक्षितुम् ॥ २७ ॥
**इन्द्र बोले—**देवि! मनुष्योंमें जो ब्राह्मणभक्त और सत्यवादी श्रेष्ठ पुरुष हैं, वे आपके चौथे पादका भार वहन करें; क्योंकि श्रेष्ठ पुरुष उसे सहन करनेमें पूर्ण समर्थ हैं ॥ २७ ॥
श्रीरुवाच
एष मे निहितः पादो योऽयं सत्सु प्रतिष्ठितः ।
एवं हि निहितां शक्र भूतेषु परिधत्स्व माम् ॥ २८ ॥
**लक्ष्मीने कहा—**इन्द्र! यह मैंने अपना चौथा पाद रखा। अब यह सत्पुरुषोंमें प्रतिष्ठित हुआ। इसी प्रकार तुम अब सम्पूर्ण भूतोंमें मुझे स्थापित करके सब ओरसे मेरी रक्षा करो ॥ २८ ॥
शक्र उवाच
भूतानामिह यो वै त्वां मया विनिहितां सतीम् ।
उपहन्यात् स मे धृष्यस्तथा शृण्वन्तु मे वचः ॥ २९ ॥
**इन्द्रने कहा—**देवि! मेरेद्वारा स्थापित की हुई आपको समस्त प्राणियोंमेंसे जो भी पीड़ा देगा, वह मेरेद्वारा दण्डनीय होगा। मेरी यह बात वे सब लोग सुन लें ॥
ततस्त्यक्तः श्रिया राजा दैत्यानां बलिरब्रवीत् ।