महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1483, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंध्यातव्यं मनसा हृद्यं कल्याणं संविजानता । अतः समझदार पुरुषको वैमनस्यके कारण प्राप्त हुए दुःखका निवारण करके मन-ही-मन हृदयस्थित कल्याणमय परमात्माका चिन्तन करना चाहिये ॥ ६½ ॥
यदा यदा हि पुरुषः कल्याणे कुरुते मनः । तदा तस्य प्रसिध्यन्ति सर्वार्था नात्र संशयः ॥ ७ ॥ पुरुष जब-जब कल्याणस्वरूप परमात्माके चिन्तनमें मन लगाता है, तब-तब उसके सारे मनोरथ सिद्ध होते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ७ ॥
एकः शास्ता न द्वितीयोऽस्ति शास्ता गर्भे शयानं पुरुषं शास्ति शास्ता । तेनानुयुक्तः प्रवणादिवोदकं यथा नियुक्तोऽस्मि तथा वहामि ॥ ८ ॥ जगत्का शासन करनेवाला एक ही है, दूसरा नहीं। वही शासक गर्भमें सोये हुए जीवका भी शासन करता है, जैसे जल निम्न स्थानकी ओर ही प्रवाहित होता है, उसी प्रकार प्राणी उस शासकसे प्रेरित होकर उसकी अभीष्ट दिशाको ही गमन करता है। उस ईश्वरकी जैसी प्रेरणा होती है, उसीके अनुसार मैं भी कार्यभार वहन करता हूँ ॥ ८ ॥
भवाभवौ त्वभिजानन् गरीयो ज्ञानाच्छ्रेयो न तु तद् वै करोमि । आशासु धर्म्यासु परासु कुर्वन् यथा नियुक्तोऽस्मि तथा वहामि ॥ ९ ॥ मैं प्राणियोंके अभ्युदय और पराभवको जानता हूँ। श्रेष्ठ तत्त्वसे भी परिचित हूँ और ज्ञानसे कल्याणकी प्राप्ति होती है, इस बातको भी समझता हूँ, तथापि उसका सम्पादन नहीं करता हूँ। इसके विपरीत धर्म-सम्मत अथवा अधर्मयुक्त आशाएँ मनमें लेकर जैसी अन्तर्यामीकी प्रेरणा होती है, उसके अनुसार कार्यभार वहन करता हूँ ॥ ९ ॥
यथा यथास्य प्राप्तव्यं प्राप्नोत्येव तथा तथा । भवितव्यं यथा यच्च भवत्येव तथा तथा ॥ १० ॥ पुरुषको जो वस्तु जिस प्रकार मिलनेवाली होती है, वह उस प्रकार मिल ही जाती है। जिस वस्तुकी जैसी होनहार होती है, वह वैसी होती ही है ॥ १० ॥
यत्र यत्रैव संयुक्तो धात्रा गर्भे पुनः पुनः । तत्र तत्रैव वसति न यत्र स्वयमिच्छति ॥ ११ ॥ विधाता जिस-जिस गर्भमें रहनेके लिये जीवको बार-बार प्रेरित करते हैं, वह जीव उसी-उसी गर्भमें वास करता है; किंतु वह स्वयं जहाँ रहनेकी इच्छा करता है, वहाँ नहीं रह पाता है ॥ ११ ॥
भावो योऽयमनुप्राप्तो भवितव्यमिदं मम ।