महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1485, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंएवं प्रवृद्धं प्रणुदन्मनोजं संतापनीयं सकलं शरीरात् ॥ १७ ॥ पुरुष जिस-जिस अवस्थाको प्राप्त हो, उसीमें उसे संतप्त न होकर आनन्द मानना चाहिये। इस प्रकार संतापजनक बढ़े हुए कामको अपने शरीर और मनसे पूर्णतः निकाल दे ॥ १७ ॥ न तत्सदःसत्परिषत् सभा च सा प्राप्य यां न कुरुते सदा भयम् । धर्मतत्त्वमवगाह्य बुद्धिमान् योऽभ्युपैति स धुरंधरः पुमान् ॥ १८ ॥ न तो ऐसी कोई सभा है, न साधु-सत्पुरुषोंकी कोई परिषद् है और न कोई ऐसा जनसमाज ही है, जिसे पाकर कोई पुरुष कभी भय न करे। जो बुद्धिमान् धर्मतत्त्वमें अवगाहन करके उसीको अपनाता है, वही धुरंधर माना गया है ॥ १८ ॥ प्राज्ञस्य कर्माणि दुरन्वयानि न वै प्राज्ञो मुह्यति मोहकाले । स्थानाच्च्युतश्चैन्न मुमोह गौतम- स्तावत् कृच्छ्रामापदं प्राप्य वृद्धः ॥ १९ ॥ विद्वान् पुरुषके सारे कार्य साधारण लोगोंके लिये दुर्बोध होते हैं। विद्वान् पुरुष मोहके अवसरपर भी मोहित नहीं होता। जैसे वृद्ध गौतममुनि अत्यन्त कष्टजनक विपत्तिमें पड़कर और पदच्युत होकर भी मोहित नहीं हुए ॥ १९ ॥ न मन्त्रबलवीर्येण प्रज्ञया पौरुषेण च । न शीलेन न वृत्तेन तथा नैवार्थसम्पदा । अलभ्यं लभते मर्त्यस्तत्र का परिदेवना ॥ २० ॥ जो वस्तु नहीं मिलनेवाली होती है, उसको कोई मनुष्य मन्त्र, बल, पराक्रम, बुद्धि, पुरुषार्थ, शील, सदाचार और धन-सम्पत्तिसे भी नहीं पा सकता; फिर उसके लिये शोक क्यों किया जाय? ॥ २० ॥ यदेवमनुजातस्य धातारो विदधुः पुरा । तदेवानुचरिष्यामि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ २१ ॥ पूर्वकालमें विधाताने मेरे लिये जैसा विधान रच रखा है, मैं जन्मके पश्चात् उसीका अनुसरण करता आया हूँ और आगे भी करूँगा; अतः मृत्यु मेरा क्या करेगी? ॥ २१ ॥ लब्धव्यान्येव लभते गन्तव्यान्येव गच्छति । प्राप्तव्यान्येव चाप्नोति दुःखानि च सुखानि च ॥ २२ ॥ मनुष्यको प्रारब्धके विधानसे जो कुछ पाना है, उसीको वह पाता है। जहाँ जाना है, वहीं वह जाता है और जो भी सुख या दुःख उसके लिये प्राप्तव्य हैं, उन्हें वह प्राप्त करता