महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 149, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! ये विद्याएँ (धार्मिक क्रियाएँ) क्षत्रियोंको सदा सिद्धि प्रदान करनेवाली हैं। इस विषयमें बृहस्पतिजीने इस गाथाका भी गान किया है ॥ १४ ॥
भूमिरेतौ निगिरति सर्पं बिलशयानिव ।
राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥ १५ ॥
‘जैसे साँप बिलमें रहनेवाले चूहे आदि जीवोंको निगल जाता है, उसी प्रकार विरोध न करनेवाले राजा और परदेशमें न जानेवाले ब्राह्मण—इन दो व्यक्तियोंको भूमि निगल जाती है ॥ १५ ॥
सुद्युम्नश्चापि राजर्षिः श्रूयते दण्डधारणात् ।
प्राप्तवान् परमां सिद्धिं दक्षः प्राचेतसो यथा ॥ १६ ॥
सुना जाता है कि राजर्षि सुद्युम्नने दण्डधारणके द्वारा ही प्रचेताकुमार दक्षके समान परम सिद्धि प्राप्त कर ली ॥
युधिष्ठिर उवाच
भगवन् कर्मणा केन सुद्युम्नो वसुधाधिपः ।
संसिद्धिं परमां प्राप्तः श्रोतुमिच्छामि तं नृपम् ॥ १७ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! पृथिवीपति सुद्युम्नने किस कर्मसे परम सिद्धि प्राप्त कर ली थी। मैं उन नरेशका चरित्र सुनना चाहता हूँ ॥ १७ ॥
व्यास उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
शंखश्च लिखितश्चास्तां भ्रातरौ संशितव्रतौ ॥ १८ ॥
व्यासजीने कहा— युधिष्ठिर! इस विषयमें लोग इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं—शंख और लिखित नामवाले दो भाई थे। दोनों ही कठोर व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी थे ॥ १८ ॥
तयोरावसथावास्तां रमणीयौ पृथक् पृथक् ।
नित्यपुष्पफलैर्वृक्षैरुपेतो बाहुदामनु ॥ १९ ॥
बाहुदा नदीके तटपर उन दोनोंके अलग-अलग परम सुन्दर आश्रम थे, जो सदा फल-फूलोंसे लदे रहनेवाले वृक्षोंसे सुशोभित थे ॥ १९ ॥
ततः कदाचिल्लिखितः शंखस्याश्रममागतः ।
यदृच्छयाथ शंखोऽपि निष्क्रान्तोऽभवदाश्रमात् ॥ २० ॥
एक दिन लिखित शंखके आश्रमपर आये। दैवेच्छासे शंख भी उसी समय आश्रमसे बाहर निकल गये थे ॥
सोऽभिगम्याश्रमं भ्रातुः शंखस्य लिखितस्तदा ।
फलानि पातयामास सम्यक्परिणतान्युत ॥ २१ ॥