भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1499, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1499

तेन शक्र न शोचामि नास्ति शोके सहायता ।
इन्द्र! जो कालके प्रभावको जानता है, वह उससे आक्रान्त होकर भी शोक नहीं करता; क्योंकि विपत्ति दूर करनेमें शोकसे कोई सहायता नहीं मिलती, इसलिये मैं शोक नहीं करता हूँ ।। ८६ १/२ ।।
यदा हि शोचतः शोको व्यसनं नापकर्षति ।। ८७ ।।
सामर्थ्यं शोचतो नास्तीत्यतोऽहं नाद्य शोचिमि ।
जब शोक करनेवाले पुरुषका शोक उसके संकटको दूर नहीं हटा पाता है, उलटे शोकग्रस्त मनुष्यकी शक्ति क्षीण हो जाती है, तब शोक क्यों किया जाय? यही सोचकर मैं शोक नहीं करता हूँ ।। ८७ १/२ ।।
एवमुक्तः सहस्राक्षो भगवान् पाकशासनः ।। ८८ ।।
प्रतिसंहृत्य संरम्भमित्युवाच शतक्रतुः ।
बलिके ऐसा कहनेपर सहस्रनेत्रधारी पाकशासन शतक्रतु भगवान् इन्द्रने अपने क्रोधको रोककर इस प्रकार कहा— ।। ८८ १/२ ।।
सवज्रमुद्यतं बाहुं दृष्ट्वा पाशांश्च वारुणान् ।। ८९ ।।
कस्येह न व्यथेद् बुद्धिर्मृत्योरपि जिघांसतः ।
सा ते न व्यथते बुद्धिरचला तत्त्वदर्शिनी ।। ९० ।।
'दैत्यराज! मेरे हाथको वज्र एवं वरुणपाशसहित ऊपर उठा देखकर मारनेकी इच्छासे आयी हुई मृत्युका भी दिल दहल जाता है; फिर दूसरा कौन है जिसकी बुद्धि व्यथित न हो। तुम्हारी बुद्धि तत्त्वको जाननेवाली और स्थिर है; इसलिये तनिक भी विचलित नहीं होती है ।। ८९-९० ।।
ध्रुवं न व्यथसेऽद्य त्वं धैर्यात् सत्यपराक्रम ।
को हि विश्वासमर्थेषु शरीरे वा शरीरभृत् ।। ९१ ।।
कर्तुमुत्सहते लोके दृष्ट्वा सम्प्रस्थितं जगत् ।
'सत्यपराक्रमी वीर! तुम निश्चय ही धैर्यके कारण व्यथित नहीं होते हो। इस सम्पूर्ण जगत्को विनाशकी ओर जाते देखकर कौन शरीरधारी पुरुष धन-वैभव, विषय-भोग अथवा अपने शरीरपर भी विश्वास कर सकता है? ।। ९१ १/२ ।।
अहमप्येवमेवैतं लोकं जानाम्यशाश्वतम् ।। ९२ ।।
कालाग्नावाहितं घोरे गुह्ये सततगेऽक्षरे ।
'मैं भी इसी प्रकार सर्वव्यापी, अविनाशी, घोर एवं गुह्य कालाग्निमें पड़े हुए इस जगत्को क्षणभंगुर ही जानता हूँ ।। ९२ १/२ ।।
न चात्र परिहारोऽस्ति कालस्पृष्टस्य कस्यचित् ।। ९३ ।।
सूक्ष्माणां महतां चैव भूतानां परिपच्यताम् ।

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