महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1508, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंमैं समस्त प्राणियोंको ऐश्वर्य प्रदान करनेके लिये सूर्यकी किरणोंके तापसे खिले हुए कमलमें प्रकट हुई हूँ। मेरा नाम पद्मा, श्री और पद्ममालिनी है ॥ २१ ॥ अहं लक्ष्मीरहं भूतिः श्रीश्चाहं बलसूदन । अहं श्रद्धा च मेधा च संनतिर्विजितिः स्थितिः ॥ २२ ॥ अहं धृतिरहं सिद्धिरहं त्विड् भूतिरेव च । अहं स्वाहा स्वधा चैव संस्तुतिर्नियतिः स्मृतिः ॥ २३ ॥ बलसूदन! मैं ही लक्ष्मी हूँ। मैं ही भूति हूँ और मैं ही श्री हूँ। मैं श्रद्धा, मेधा, संनति, विजिति, स्थिति, धृति, सिद्धि, कान्ति, समृद्धि, स्वाहा, स्वधा, संस्तुति, नियति और स्मृति हूँ ॥ २२-२३ ॥ राज्ञां विजयमानानां सेनाग्रेषु ध्वजेषु च । निवासे धर्मशीलानां विषयेषु पुरेषु च ॥ २४ ॥ युद्धमें विजय पानेवाले राजाओंकी सेनाओंके अग्रभागमें फहरानेवाले ध्वजाओंपर और स्वभावसे ही धर्माचरण करनेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंके निवासस्थानमें, उनके राज्य और नगरोंमें भी मैं सदा निवास करती हूँ ॥ २४ ॥ जितकाशिनि शूरे च संग्रामेष्वनिवर्तिनि । निवसामि मनुष्येन्द्रे सदैव बलसूदन ॥ २५ ॥