महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1528, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसीलिये वे सर्वत्र पूजित होते हैं ।। १९ ।। नासूयत्यागमं कंचित् स्वनयेनोपजीवति । अवन्ध्यकालो वश्यात्मा तस्मात् सर्वत्र पूजितः ।। २० ।। वे किसी शास्त्रमें दोषदृष्टि नहीं करते। अपनी नीतिके अनुसार जीवन-यापन करते हैं। समयको कभी व्यर्थ नहीं गँवाते और मनको वशमें रखते हैं; इसीलिये वे सर्वत्र सम्मानित होते हैं ।। २० ।। कृतश्रमः कृतप्रज्ञो न च तृप्तः समाधितः । नित्ययुक्तोऽप्रमत्तश्च तस्मात् सर्वत्र पूजितः ।। २१ ।। उन्होंने योगाभ्यासके लिये बड़ा परिश्रम किया है। उनकी बुद्धि पवित्र है। उन्हें समाधिसे कभी तृप्ति नहीं होती। वे कर्तव्य-पालनके लिये सदा उद्यत रहते हैं और कभी प्रमाद नहीं करते हैं; इसीलिये सर्वत्र पूजे जाते हैं ।। २१ ।। नापत्रपश्व युक्तश्च नियुक्तः श्रेयसे परैः । अभेत्ता परगुह्यानां तस्मात् सर्वत्र पूजितः ।। २२ ।। नारदजी निर्लज्ज नहीं हैं। दूसरोंकी भलाईके लिये सदा उद्यत रहते हैं; इसीलिये दूसरे लोग उन्हें अपने कल्याणकारी कार्योंमें लगाये रखते हैं तथा वे किसीके गुप्त रहस्यको कहीं प्रकट नहीं करते हैं; इसीलिये उनका सर्वत्र सम्मान होता है ।। २२ ।। न हृष्यत्यर्थलाभेषु नालाभे तु व्यथत्यपि । स्थिरबुद्धिरसक्तात्मा तस्मात् सर्वत्र पूजितः ।। २३ ।। वे धनका लाभ होनेसे प्रसन्न नहीं होते और उसके न मिलनेसे उन्हें दुःख भी नहीं होता है। उनकी बुद्धि स्थिर और मन आसक्तिरहित है; इसीलिये वे सर्वत्र पूजित हुए हैं ।। २३ ।। तं सर्वगुणसम्पन्नं दक्षं शुचिमनामयम् । कालज्ञं च प्रियज्ञं च कः प्रियं न करिष्यति ।। २४ ।। वे सम्पूर्ण गुणोंसे सुशोभित, कार्यकुशल, पवित्र, नीरोग, समयका मूल्य समझनेवाले और परम प्रिय आत्मतत्त्वके ज्ञाता हैं; फिर कौन उन्हें अपना प्रिय नहीं बनायेगा? ।। २४ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वासुदेवोग्रसेनसंवादे त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २३० ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें श्रीकृष्ण और उग्रसेनका संवादविषयक दो सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २३० ।।