भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1536, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1536

वायोरपि विकुर्वाणाज्ज्योतिर्भवति भास्वरम् । रोचिष्णु जायते शुक्लं तद्रूपगुणमुच्यते ॥ ६ ॥ फिर वायुमें भी विकार होता है और उससे प्रकाशपूर्ण अग्नि-तत्त्व प्रकट होता है। वह अग्नि-तत्त्व चमचमाता हुआ एवं दीप्तिमान् है। उसका गुण ‘रूप’ बताया जाता है ॥ ६ ॥ ज्योतिषोऽपि विकुर्वाणाद् भवन्त्यापो रसात्मिकाः । अद्भ्यो गन्धवहा भूमिः सर्वेषां सृष्टिरुच्यते ॥ ७ ॥ फिर अग्नि-तत्त्वमें विकार आनेपर रसमय जल-तत्त्वकी उत्पत्ति होती है। जलसे गन्धका वहन करनेवाली पृथ्वीका प्रादुर्भाव होता है। इस प्रकार पञ्चमहाभूतोंकी सृष्टि बतायी जाती है ॥ ७ ॥ गुणाः सर्वस्य पूर्वस्य प्राप्नुवन्त्युत्तरोत्तरम् । तेषां यावद् यथा यच्च तत्तत् तावद्गुणं स्मृतम् ॥ ८ ॥ पीछे प्रकट हुए वायु आदि भूत उत्तरोत्तर अपने पूर्ववर्ती सभी भूतोंके गुण धारण करते हैं। इन सब भूतोंमेंसे जो भूत जितने समयतक जिस प्रकार रहता है, उसके गुण भी उतने ही समयतक रहते हैं ॥ ८ ॥ उपलभ्याप्सु चेद् गन्धं केचिद् ब्रूयुरनैपुणात् । पृथिव्यामेव तं विद्यादपां वायोश्च संश्रितम् ॥ ९ ॥ यदि कुछ मनुष्य जलमें गन्ध पाकर अयोग्यतावश यह कहने लगें कि यह जलका ही गुण है तो उनका वह कथन मिथ्या होगा; क्योंकि गन्ध वास्तवमें पृथ्वीका गुण है; अतः उसे पृथ्वीमें ही स्थित जानना चाहिये। जल और वायुमें तो वह आगन्तुककी भाँति स्थित होता है ॥ ९ ॥ एते सप्तविधात्मानो नानावीर्याः पृथक् पृथक् । नाशक्नुवन् प्रजाः स्रष्टुमसमागम्य कृत्स्नशः ॥ १० ॥ ये नाना प्रकारकी शक्तिवाले महत्तत्त्व, मन (अहंकार) और पञ्चसूक्ष्म महाभूत—सात पदार्थ पृथक्-पृथक् रहकर जबतक सब-के-सब मिल न सकें; तबतक उनमें प्रजाकी सृष्टि करनेकी शक्ति नहीं आयी ॥ १० ॥ ते समेत्य महात्मानो ह्यन्योन्यमभिसंश्रिताः । शरीराश्रयणं प्राप्तास्ततः पुरुष उच्यते ॥ ११ ॥ परंतु ये सातों व्यापक पदार्थ ईश्वरकी इच्छा होनेपर जब एक-दूसरेसे मिलकर परस्पर सहयोगी हो गये, तब भिन्न-भिन्न शरीरके आकारमें परिणत हुए। उस शरीरनामक पुरमें निवास करनेके कारण जीवात्मा पुरुष कहलाता है ॥ ११ ॥ शरीरं श्रयणाद् भवति मूर्तिमत् षोडशात्मकम् ।