भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 154

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चतुर्विंशोऽध्यायः

व्यासजीका युधिष्ठिरको राजा हयग्रीवका चरित्र सुनाकर उन्हें राजोचित कर्तव्यका पालन करनेके लिये जोर देना

वैशम्पायन उवाच

पुनरेव महर्षिस्तं कृष्णद्वैपायनो मुनिः ।
अजातशत्रुं कौन्तेयमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! श्रीकृष्णद्वैपायन महर्षि व्यासजीने अजातशत्रु कुन्तीकुमार युधिष्ठिरसे पुनः इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

अरण्ये वसतां तात भ्रातृणां ते मनस्विनाम् ।
मनोरथा महाराज ये तत्रासन् युधिष्ठिर ॥ २ ॥
तानिमे भरतश्रेष्ठ प्राप्नुवन्तु महारथाः ।
‘तात! महाराज युधिष्ठिर! वनमें रहते समय तुम्हारे मनस्वी भाइयोंके मनमें जो-जो मनोरथ उत्पन्न हुए थे, भरतश्रेष्ठ! उन्हें ये महारथी वीर प्राप्त करें ॥ २ १/२ ॥

प्रशाधि पृथिवीं पार्थ ययातिरिव नाहूषः ॥ ३ ॥
अरण्ये दुःखवसतिरनुभूता तपस्विभिः ।
दुःखस्यान्ते नरव्याघ्र सुखान्यनुभवन्तु वै ॥ ४ ॥
‘कुन्तीनन्दन! तुम नहुषपुत्र ययातिके समान इस पृथिवीका पालन करो। तुम्हारे इन तपस्वी भाइयोंनें वनवासके समय बड़े दुःख उठाये हैं। नरव्याघ्र! अब ये उस दुःखके बाद सुखका अनुभव करें ॥ ३-४ ॥

धर्ममर्थं च कामं च भ्रातृभिः सह भारत ।
अनुभूय ततः पश्चात् प्रस्थातासि विशाम्पते ॥ ५ ॥
‘भरतनन्दन! प्रजानाथ! इस समय भाइयोंके साथ तुम धर्म, अर्थ और कामका उपभोग करो। पीछे वनमें चले जाना ॥ ५ ॥

अर्थिनां च पितॄणां च देवतानां च भारत ।
आनृण्यं गच्छ कौन्तेय तत् सर्वं च करिष्यसि ॥ ६ ॥
‘भरतनन्दन! कुन्तीकुमार! पहले याचकों, पितरों और देवताओंके ऋणसे उऋण हो लो, फिर वह सब करना ॥

सर्वमेधाश्वमेधाभ्यां यजस्व कुरुनन्दन ।
ततः पश्चान्महाराज गमिष्यसि परां गतिम् ॥ ७ ॥

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