भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1556, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1556

जिसके पास ज्ञानमयी नौका नहीं है, वह मोहितचित्त मूढ़ मानव महान् दोषको प्राप्त

होता है। कामरूपी ग्राहसे पीड़ित होनेके कारण ज्ञान भी उसके लिये नौका नहीं बन

पाता ।। २१ ।।

तस्मादुन्मज्जनस्यार्थे प्रयतेत विचक्षणः ।

एतदुन्मज्जनं तस्य यदयं ब्राह्मणो भवेत् ।। २२ ।।

इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको कालनद या भवसागरसे पार होनेका अवश्य प्रयत्न करना

चाहिये। उसका पार होना यही है कि वह वास्तवमें ब्राह्मण बन जाय अर्थात् ब्रह्मज्ञान प्राप्त

करे ।। २२ ।।

अवदातेषु संजातस्त्रिसंदेहस्त्रिकर्मकृत् ।

तस्मादुन्मज्जने तिष्ठेत् प्रज्ञया निस्तरेद् यथा ।। २३ ।।

उत्तम कुलमें उत्पन्न हुआ ब्राह्मण अध्यापन, याजन और प्रतिग्रह—इन तीन कर्मोंको

संदेहकी दृष्टिसे देखे (कि कहीं इनमें आसक्त न हो जाऊँ) और अध्ययन, यजन तथा दान

—इन तीन कर्मोंका अवश्य पालन करे। वह जैसे भी हो प्रज्ञाद्वारा अपने उद्धारका प्रयत्न

करे, उस कालनदसे पार हो जाय ।। २३ ।।

संस्कृतस्य हि दान्तस्य नियतस्य यतात्मनः ।

प्राज्ञस्यानन्तरा सिद्धिरिहलोके परत्र च ।। २४ ।।

जिसके वैदिक संस्कार विधिवत् सम्पन्न हुए हैं, जो नियमपूर्वक रहकर मन और

इन्द्रियोंपर विजय पा चुका है, उस विज्ञ पुरुषको इहलोक और परलोकमें कहीं भी सिद्धि

प्राप्त होते देर नहीं लगती ।। २४ ।।

वर्तेत तेषु गृहवानक्रुद्ध्यन्ननसूयकः ।

पञ्चभिः सततं यज्ञैर्विघसाशी यजेत च ।। २५ ।।

गृहस्थ ब्राह्मण क्रोध और दोष-दृष्टिका त्याग करके पूर्वोक्त नियमोंके पालनमें संलग्न

रहे। नित्य पञ्चमहायज्ञोंका अनुष्ठान करे और यज्ञशिष्ट अन्नका ही भोजन करे ।। २५ ।।

सतां धर्मेण वर्तेत क्रियां शिष्टवदाचरेत् ।

असंरोधेन लोकस्य वृत्तिं लिप्सेदगर्हिताम् ।। २६ ।।

श्रेष्ठ पुरुषोंके धर्मके अनुसार चले और शिष्टाचारका पालन करे तथा ऐसी आजीविका

प्राप्त करनेकी इच्छा करे, जिससे दूसरे लोगोंकी जीविकाका हनन न हो और जिसकी

लोकमें निन्दा न होती हो ।। २६ ।।

श्रुतिविज्ञानतत्त्वज्ञः शिष्टाचारो विचक्षणः ।

स्वधर्मेण क्रियावांश्च कर्मणा सोऽप्यसंकरः ।। २७ ।।

ब्राह्मणको वेदका विद्वान्, तत्त्वज्ञानी, सदाचारी और चतुर होना चाहिये। वह अपने

धर्मके अनुसार कार्य करे, परंतु कर्मद्वारा संकरता न फैलावै अर्थात् स्वधर्म और परधर्मका

सम्मिश्रण न करे ।। २७ ।।