महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1559, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंएतेषां चेदनुद्रष्टा पुरुषोऽपि सुदारुणः ॥ ५ ॥ यदि वा सर्ववेदज्ञो यदि वाप्यनृचो द्विजः । यदि वा धार्मिको यज्वा यदि वा पापकृत्तमः ॥ ६ ॥ यदि वा पुरुषव्याघ्रो यदि वा क्लेशधारितः । तरत्येवं महादुर्गं जरामरणसागरम् ॥ ७ ॥ मनुष्य अत्यन्त दारुण हो या सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञाता हो अथवा ब्राह्मण होकर भी वैदिक ज्ञानसे शून्य हो अथवा धर्मपरायण एवं यज्ञशील हो या घोर पापाचारी हो अथवा पुरुषोंमें सिंहके समान शूरवीर हो या बड़े कष्टसे जीवन धारण करता हो, वह यदि इन बारह योगोंका भलीभाँति साक्षात्कार अर्थात् ज्ञान कर ले तो जरा-मृत्युके परम दुर्गम समुद्रसे पार हो जाता है ॥ ५—७ ॥
एवं ह्येतेन योगेन युञ्जानो ह्येवमन्ततः । अपि जिज्ञासमानोऽपि शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥ ८ ॥ इस प्रकार सिद्धिपर्यन्त इस योगका अभ्यास करनेवाला पुरुष यदि ब्रह्मका जिज्ञासु हो तो वेदोक्त सकाम कर्मोंकी सीमाको लाँघ जाता है ॥ ८ ॥
धर्मोपस्थो ह्रीवरूथ उपायापायकूबरः । अपानाक्षः प्राणयुगः प्रज्ञायुर्जीवबन्धनः ॥ ९ ॥ चेतनाबन्धुरश्चारुश्चाचारग्रहनेमिमान् । दर्शनस्पर्शनवहो घ्राणश्रवणवाहनः ॥ १० ॥ प्रज्ञानाभिः सर्वतन्त्रप्रतोदो ज्ञानसारथिः । क्षेत्रज्ञाधिष्ठितो धीरः श्रद्धादमपुरःसरः ॥ ११ ॥ त्यागसूक्ष्मानुगः क्षेम्यः शौचगो ध्यानगोचरः । जीवयुक्तो रथो दिव्यो ब्रह्मलोके विराजते ॥ १२ ॥ यह योग एक सुन्दर रथ है। धर्म ही इसका पिछला भाग या बैठक है। लज्जा आवरण है। पूर्वोक्त उपाय और अपाय इसका कूबर है। अपानवायु धुरा है। प्राणवायु जूआ हैं। बुद्धि आयु है। जीवन बन्धन है। चैतन्य बन्धुर है। सदाचार-ग्रहण इस रथकी नेमि हैं। नेत्र, त्वचा, घ्राण और श्रवण इसके वाहन हैं। प्रज्ञा नाभि है। सम्पूर्ण शास्त्र चाबुक है। ज्ञान सारथि है। क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) इसपर रथी बनकर बैठा हुआ है। यह रथ धीरे-धीरे चलनेवाला है। श्रद्धा और इन्द्रियदमन इस रथके आगे-आगे चलनेवाले रक्षक हैं। त्यागरूपी सूक्ष्म गुण इसके अनुगामी (पृष्ठ-रक्षक) हैं। यह मंगलमय रथ ध्यानके पवित्र मार्गपर चलता है। इस प्रकार यह जीवयुक्त दिव्य रथ ब्रह्मलोकमें विराजमान होता है। अर्थात् इसके द्वारा जीवात्मा परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ॥ ९—१२ ॥
अथ संत्वरमाणस्य रथमेवं युयुक्षतः ।