महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1567, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंयद्यपि इन्द्रियोंद्वारा दिखायी नहीं देता तो भी उसकी उपलब्धि दिव्य-ज्ञानके द्वारा अवश्य होती है) ।। ४ ।। ये चैनं पक्षमाश्रित्य निवर्तन्त्यल्पमेधसः । स्वभावं कारणं ज्ञात्वा न श्रेयः प्राप्नुवन्ति ते ।। ५ ।। जो मन्दबुद्धि मानव इस नास्तिक मतका अवलम्बन करके स्वभावहीको कारण जानकर परमेश्वरकी उपासनासे निवृत्त हो जाते हैं, वे कल्याणके भागी नहीं होते ।। ५ ।। स्वभावो हि विनाशाय मोहकर्म मनोभवः । निरुक्तमेतयोरेतत् स्वभावपरिभावयोः ।। ६ ।। नास्तिक लोग जो स्वभाववादका आश्रय लेकर ईश्वर और अदृष्टकी सत्ताको स्वीकार नहीं करते हैं, यह उनका मोहजनित कार्य है, स्वभाववाद मूढ़ोंकी कल्पना-मात्र है। यह मानवोंको परमार्थसे वंचित करके उनका विनाश करनेके लिये ही उपस्थित किया गया है। स्वभाव और परिभावके तत्त्वका यह आगे बताया जानेवाला विवेचन सुनो ।। ६ ।। कृष्यादीनीह कर्माणि सस्यसंहरणानि च । प्रज्ञावद्भिः प्रक्लृप्तानि यानासनगृहाणि च ।। ७ ।। देखा जाता है कि जगत्में बुद्धिसम्पन्न चेतन प्राणियोंद्वारा ही भूमिको जोतने आदिके कार्य, अनाजके बीजोंका संग्रह तथा सवारी, आसन और गृहनिर्माण—ये सब कार्य सदासे किये जाते हैं। यदि स्वभावसे ये कार्य हो जाते तो कोई इनमें प्रवृत्त ही न होता ।। ७ ।। आक्रीडानां गृहाणां च गदानामगदस्य च । प्रज्ञावन्तः प्रयोक्तारो ज्ञानवद्भिरनुष्ठिताः ।। ८ ।। बेटा! चेतन प्राणी क्रीडाके लिये स्थान और रहनेके लिये घर बनाते हैं। वे ही रोगोंको पहचानकर उनपर ठीक-ठीक दवाका प्रयोग करते हैं। बुद्धिमान् पुरुषोंद्वारा ही इन सब कार्योंका यथावत् अनुष्ठान होता है (स्वभावसे—अपने-आप नहीं) ।। ८ ।। प्रज्ञा संयोजयत्यर्थैः प्रज्ञा श्रेयोऽधिगच्छति । राजानो भुञ्जते राज्यं प्रज्ञया तुल्यलक्षणाः ।। ९ ।। बुद्धि ही धनकी प्राप्ति कराती है। बुद्धिसे ही मनुष्य कल्याणको प्राप्त होता है। एक-से लक्षणोंवाले राजाओंमें भी जो बुद्धिमें बढ़े-चढ़े होते हैं, वे ही राज्यका उपभोग और दूसरोंपर शासन करते हैं ।। ९ ।। परावरं तु भूतानां ज्ञानेनैवोपलभ्यते । विद्यया तात सृष्टानां विद्यैवेह परा गतिः ।। १० ।। तात! प्राणियोंके स्थूल-सूक्ष्म या छोटे-बड़ेका भेद बुद्धिसे ही जाना जाता है। इस जगत्में सब प्राणियोंकी सृष्टि विद्यासे हुई है और उनकी परम गति विद्या ही है ।। १० ।। भूतानां जन्म सर्वेषां विविधानां चतुर्विधम् । जरायुजाण्डजोद्भिज्जस्वेदजं चोपलक्षयेत् ।। ११ ।।