महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1573, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ १३ ॥ क्योंकि ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्यायसे ही कृतकृत्य हो जाता है। वह और कोई कार्य करे या न करे, सब प्राणियोंके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाला होनेके कारण ही वह ब्राह्मण कहलाता है ॥ १३ ॥
त्रेतादौ केवला वेदा यज्ञा वर्णाश्रमास्तथा । संरोधादायुषस्त्वेते व्यस्यन्ते द्वापरे युगे ॥ १४ ॥ सत्ययुग और त्रेतामें वेद, यज्ञ तथा वर्णाश्रम धर्म विशुद्ध रूपमें पालित होते हैं, परंतु द्वापरयुगमें लोगोंकी आयुका ह्रास होनेके कारण ये भी क्षीण होने लगते हैं ॥
द्वापरे विप्लवं यान्ति वेदाः कलियुगे तथा । दृश्यन्ते नापि दृश्यन्ते कलेरन्ते पुनः किल ॥ १५ ॥ द्वापर और कलियुगमें वेद प्रायः लुप्त हो जाते हैं। कलियुगके अन्तिम भागमें तो वे कभी कहीं दिखायी देते हैं और कभी दिखायी भी नहीं देते हैं ॥ १५ ॥
उत्सीदन्ति स्वधर्माश्च तत्राधर्मेण पीडिताः । गवां भूमेश्च ये चापामोषधीनां च ये रसाः ॥ १६ ॥ उस समय अधर्मसे पीड़ित हो सभी वर्णोंके स्वधर्म नष्ट हो जाते हैं। गौ, जल, भूमि और ओषधियोंके रस भी नष्टप्राय हो जाते हैं ॥ १६ ॥
अधर्मान्तर्हिता वेदा वेदधर्मास्तथाऽऽश्रमाः । विक्रियन्ते स्वधर्मस्थाः स्थावराणि चराणि च ॥ १७ ॥ वेद, वैदिक धर्म तथा स्वधर्मपरायण आश्रम—ये सभी उस समय अधर्मसे आच्छादित हो अदृश्य हो जाते हैं और स्थावर-जंगम सभी प्राणी अपने धर्मसे विकृत हो जाते हैं; अर्थात् सबमें विकार उत्पन्न हो जाता है ॥ १७ ॥
यथा सर्वाणि भूतानि वृष्टिर्भौमानि वर्षति । सृजते सर्वतोऽङ्गानि तथा वेदा युगे युगे ॥ १८ ॥ जैसे वर्षा भूतलके समस्त प्राणियोंको उत्पन्न करती है और सर्व ओरसे उनके अंगोंको पुष्ट करती है, उसी प्रकार वेद प्रत्येक युगमें सम्पूर्ण योगाङ्गोंका पोषण करते हैं ॥ १८ ॥
निश्चितं कालनानात्वमनादिनिधनं च यत् । कीर्तितं यत् पुरस्तान्मे सूते यच्चात्ति च प्रजाः ॥ १९ ॥ इसी प्रकार निश्चय ही कालके भी अनेक रूप हैं। उसका न आदि है और न अन्त। वही प्रजाकी सृष्टि करता है और अन्तमें वही सबको अपना ग्रास बना लेता है। यह बात मैंने तुमको पहले ही बता दी है ॥ १९ ॥
यच्चेदं प्रभवः स्थानं भूतानां संयमो यमः । स्वभावेनैव वर्तन्ते द्वन्द्वसृष्टानि भूरिशः ॥ २० ॥