महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1577, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंइन्द्रियाँ, इन्द्रियोंके रूप, रस आदि विषय, स्वभाव [शीतोष्णादि धर्म], चेतना*, मन, प्राण, अपान और जीव—ये देहधारियोंके शरीरोंमें सदा विद्यमान रहते हैं ।। १३ ।। आश्रयो नास्ति सत्त्वस्य गुणाः शब्दो न चेतना । सत्त्वं हि तेजः सृजति न गुणान् वै कथंचन ।। १४ ।। शरीर भी वास्तवमें सत्त्व अर्थात् बुद्धिका आश्रय नहीं है; क्योंकि पाञ्चभौतिक शरीर तो उसका कार्य है तथा गुण, शब्द एवं चेतना भी बुद्धिके आश्रय (कारण) नहीं हैं; क्योंकि बुद्धि चेतनाकी सृष्टि करती है, परंतु बुद्धि त्रिगुणात्मिका प्रकृतिको उत्पन्न नहीं करती; क्योंकि बुद्धि स्वयं उसका कार्य है ।। १४ ।। एवं सप्तदशं देहे वृतं षोडशभिर्गुणैः । मनीषी मनसा विप्रः पश्यत्यात्मानमात्मनि ।। १५ ।। इस प्रकार बुद्धिमान् ब्राह्मण इस शरीरमें पाँच इन्द्रिय, पाँच विषय, स्वभाव, चेतना, मन, प्राण, अपान और जीव—इन सोलह तत्त्वोंसे आवृत सत्रहवें परमात्माका बुद्धिके द्वारा अन्तःकरणमें साक्षात्कार करता है ।। १५ ।। न ह्ययं चक्षुषा दृश्यो न च सर्वैरपीन्द्रियैः । मनसा तु प्रदीपेन महानात्मा प्रकाशते ।। १६ ।। इस परमात्माका नेत्रों अथवा सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे भी दर्शन नहीं हो सकता। यह विशुद्ध मनरूपी दीपकसे ही बुद्धिमें प्रकाशित होता है ।। १६ ।। अशब्दस्पर्शरूपं तदरसागन्धमव्ययम् । अशरीरं शरीरेषु निरीक्षेत निरिन्द्रियम् ।। १७ ।। वह आत्मतत्त्व यद्यपि शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धसे हीन, अविकारी तथा शरीर और इन्द्रियोंसे रहित है तो भी शरीरोंके भीतर ही इसका अनुसंधान करना चाहिये ।। १७ ।। अव्यक्तं सर्वदेहेषु मर्त्येषु परमाश्रितम् । योऽनुपश्यति स प्रेत्य कल्पते ब्रह्मभूयसे ।। १८ ।। जो इस विनाशशील समस्त शरीरोंमें अव्यक्तभावसे स्थित परमेश्वरका ज्ञानमयी दृष्टिसे निरन्तर दर्शन करता रहता है, वह मृत्युके पश्चात् ब्रह्मभावको प्राप्त होनेमें समर्थ हो जाता है ।। १८ ।। विद्याभिजनसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ।। १९ ।। पण्डितजन विद्या और उत्तम कुलसे सम्पन्न ब्राह्मणमें तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डालमें भी समभावसे स्थित ब्रह्मका दर्शन करनेवाले होते हैं ।। १९ ।। स हि सर्वेषु भूतेषु जङ्गमेषु ध्रुवेषु च । वसत्येको महानात्मा येन सर्वमिदं ततम् ।। २० ।।